अल नीनो के प्रभाव से भारत में सत्रह वर्षों का सबसे सूखा मानसून
प्रशांत महासागर में उत्पन्न मौसमी घटना अल नीनो के कारण इस बार देश में मानसून के दौरान सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है जिससे हालात चिंताजनक हैं।

प्रतीकात्मक फोटो
नई दिल्ली, भारत। प्रशांत महासागर में उत्पन्न होने वाली मौसमी घटना अल नीनो के कारण इस वर्ष भारत में मानसून की स्थिति काफी कमजोर बनी हुई है जिसके चलते देश को पिछले सत्रह वर्षों में सबसे सूखे मानसून का सामना करना पड़ रहा है। मौसम विज्ञान विभाग और विभिन्न एजेंसियों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार इस साल मानसूनी बारिश में भारी कमी दर्ज की गई है जिससे देश के कई हिस्सों में खरीफ की फसलों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि उत्पादन पर इसके पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को लेकर अर्थशास्त्रियों और कृषि विशेषज्ञों ने भी गहरी चिंता व्यक्त की है। समय पर पर्याप्त बारिश न होने के कारण देश भर के कई जलाशयों में जलस्तर में भी काफी गिरावट आई है जिससे आगामी दिनों में पेयजल संकट गहराने की आशंका भी बढ़ गई है। [1]
कृषि पर संकट
समय पर मानसूनी वर्षा न होने के कारण देश के प्रमुख कृषि उत्पादक राज्यों में धान और अन्य महत्वपूर्ण फसलों की बुवाई का कार्य समय पर पूरा नहीं हो सका है। किसानों को अपनी फसलों को बचाने के लिए महंगे निजी सिंचाई संसाधनों और ट्यूबवेलों का सहारा लेना पड़ रहा है जिससे उनकी लागत में भारी बढ़ोतरी हो रही है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में मौसम का मिजाज नहीं बदला तो देश में खाद्यान्न उत्पादन में खासी गिरावट आ सकती है जिसका सीधा असर आम जनता की थाली और महंगाई पर पड़ेगा। ग्रामीण इलाकों में किसानों की आर्थिक स्थिति पहले ही चुनौतीपूर्ण रही है और ऐसे में सूखे जैसे हालात उनके जीवनयापन को और अधिक कठिन बना रहे हैं।
सरकार और प्रशासनिक स्तर पर भी इस स्थिति से निपटने के लिए आपातकालीन बैठकों का दौर शुरू हो गया है ताकि अल नीनो प्रभावित क्षेत्रों में किसानों को समय पर राहत और सहायता पहुंचाई जा सके। राज्य सरकारों ने केंद्र से विशेष वित्तीय पैकेज की मांग की है ताकि सूखे से निपटने के लिए जल प्रबंधन और राहत कार्यों को युद्ध स्तर पर चलाया जा सके। कृषि बीमा कंपनियों और बैंकों को भी यह निर्देश दिए गए हैं कि वे किसानों के दावों का निपटारा त्वरित गति से करें ताकि उन्हें आर्थिक संबल मिल सके। आम नागरिकों को भी पानी की एक-एक बूंद बचाने और जल का विवेकपूर्ण उपयोग करने के लिए लगातार जागरूक किया जा रहा है।
जल संरक्षण
अल नीनो के प्रभाव से देश के विभिन्न हिस्सों में भूजल स्तर लगातार नीचे खिसक रहा है जिसे नियंत्रित करने के लिए जल संरक्षण और संचयन की पारंपरिक तथा आधुनिक तकनीकों को अपनाना अनिवार्य हो गया है। प्रशासनिक अधिकारियों और विशेषज्ञों का कहना है कि वर्षा जल संचयन संरचनाओं का निर्माण हर शहर और गाँव में सख्ती से लागू किया जाना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी जल संकट की स्थितियों से निपटा जा सके। बांधों और जलाशयों में उपलब्ध मौजूदा जल का उपयोग केवल पीने और आवश्यक कार्यों के लिए प्राथमिकता के आधार पर किए जाने के निर्देश जारी किए गए हैं। इस आपदा को एक अवसर के रूप में देखते हुए जल प्रबंधन प्रणालियों को दुरुस्त करने के लिए दीर्घकालिक योजनाएं तैयार की जा रही हैं।
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मौसम के मिजाज में आ रही अनिश्चितता ने देश के नीति निर्माताओं को कृषि और जल नीतियों की नए सिरे से समीक्षा करने पर मजबूर कर दिया है। सूखा सहन करने वाली फसलों की किस्मों के अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि भविष्य में किसानों को इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं के दौरान कम से कम नुकसान उठाना पड़े। वैज्ञानिक समुदायों का यह भी सुझाव है कि सिंचाई की आधुनिक और जल-बचत प्रणालियों जैसे ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर सिस्टम को बड़े पैमाने पर अपनाया जाना चाहिए। इन तमाम प्रयासों और सामूहिक जागरूकता के माध्यम से ही हम इस प्रकार की मौसमी चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने में सक्षम हो सकेंगे।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। इस रिपोर्ट में दी गई मौसमी परिस्थितियों और आंकड़ों के विवरण को पाठकों की सामान्य जानकारी के लिए प्रस्तुत किया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए अल नीनो मानसून से जुड़े किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।