कच्चे तेल के दाम में भारी गिरावट: आम जनता को नहीं मिली कोई राहत
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन इसके बावजूद घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
प्रतीकात्मक फोटो
नई दिल्ली, भारत। वैश्विक अर्थव्यवस्था से इस वक्त एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जो सीधे तौर पर आम आदमी की जेब से जुड़ी हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से नीचे आ रहे हैं, जिससे उम्मीद जताई जा रही थी कि ईंधन की कीमतों में कटौती होगी। इस बड़ी उथल-पुथल के बाद से दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों में हड़कंप मच गया है और उपभोक्ता यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि क्या उन्हें भी इस गिरावट का सीधा फायदा मिल पाएगा। [1]
वैश्विक गिरावट
विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ दिनों के दौरान बेंचमार्क माने जाने वाले क्रूड ऑयल के मूल्य में लगातार कमजोरी का रुख देखने को मिला है। जानकारों का कहना है कि पश्चिम एशिया के हालातों और कूटनीतिक वार्ताओं में आए सकारात्मक बदलाव के कारण कच्चे तेल के दाम में यह नरमी आई है। सप्लाई से जुड़ी चिंताओं के कम होने से वैश्विक निवेशकों ने राहत की सांस ली है, जिसका असर कमोडिटी एक्सचेंज पर साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम होते इन मूल्यों ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है, क्योंकि इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्सों पर पड़ता है।
घरेलू स्तर
दूसरी तरफ यदि बात की जाए तो हमारे देश के भीतर तेल विपणन कंपनियों ने आज भी पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों में किसी प्रकार की कटौती नहीं की है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के दाम में गिरावट होने के बावजूद सरकारी तेल कंपनियों ने आम नागरिकों को मिलने वाले ईंधन के दाम पुराने स्तर पर ही स्थिर रखे हैं। इस स्थिति की वजह से उपभोक्ताओं के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में नरमी आने के बाद भी घरेलू बाजार में राहत क्यों नहीं पहुंचाई जा रही है? अधिकारी इस बात पर जोर देते हैं कि ईंधन के खुदरा मूल्य तय करने में कई अन्य आर्थिक और कर संबंधी घटक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विशेषज्ञ तर्क
इस पूरे मामले पर आर्थिक विशेषज्ञों का यह स्पष्ट रूप से मानना है कि भारत जैसे देशों में खुदरा कीमतें तुरंत कम नहीं होती हैं क्योंकि पास-थ्रू प्रभाव में समय लगता है। वर्तमान में जो कच्चा तेल देश की रिफाइनरी में पहुंच रहा है, वह पुराने और ऊंचे अनुबंधों के आधार पर खरीदा गया होता है, जिस कारण तुरंत लाभ ट्रांसफर करना संभव नहीं होता। इसके अतिरिक्त, कच्चे तेल के दाम कम होने के बावजूद सरकार और कंपनियों को पिछले नुकसान की भरपाई करनी पड़ती है, ताकि भविष्य में किसी भी बड़े संकट से आसानी से निपटा जा सके। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव का असर घरेलू उपभोक्ताओं तक पहुंचने में थोड़ा वक्त लग जाता है।
टैक्स ढांचा
भारत में पेट्रोल और डीजल की अंतिम कीमत तय होने के पीछे केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के दाम ही एकमात्र कारक नहीं होते हैं। इसमें केंद्र सरकार द्वारा लगाई जाने वाली एक्साइज ड्यूटी, राज्यों के वैट, परिवहन शुल्क और डीलरों का कमीशन जैसे कई अन्य भारी-भरकम कर शामिल होते हैं। इन सभी स्थानीय शुल्कों और टैक्सों का अनुपात बहुत अधिक होता है, जो वैश्विक कीमतों में आने वाली बड़ी गिरावट के असर को काफी हद तक बेअसर कर देता है। यही कारण है कि जब बाहर क्रूड सस्ता होता है, तब भी यहां आम जनता को ईंधन की कीमतों में उतनी बड़ी राहत देखने को नहीं मिलती जितनी की उम्मीद की जाती है।
महंगाई पर असर
ईंधन की कीमतों में किसी भी प्रकार की बड़ी राहत न मिलने के कारण परिवहन लागत और रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं के दाम पर दबाव लगातार बना हुआ है। देश के विभिन्न हिस्सों में ढुलाई महंगी होने से आम आदमी को महंगाई के मोर्चे पर अभी तक कोई खास राहत हासिल नहीं हो सकी है। विपक्षी दलों और आम जनता का यह तर्क है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम कम हो रहे हैं, तो उसका सीधा लाभ देश की जनता को भी मिलना चाहिए। आने वाले दिनों में यदि वैश्विक स्तर पर यह मंदी और अधिक लंबी चलती है, तो जनता की उम्मीदें सरकार और तेल कंपनियों से और अधिक बढ़ सकती हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer):
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