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नगर निकाय चुनाव: लोकतंत्र का अहम हिस्सा -बृज गोपाल जोशी

नगर निकाय चुनाव को लेकर एक आम मतदाता के क्या विचार हैं? निकाय चुनाव में पुराने समय से आज तक क्या क्या परिवर्तन हुए हैं, यहाँ जानें।

By अजय त्यागी
1 min read
Advertisement002309202602.jpg advertisement13Aug2026%20copy.jpg प्रतीकात्मक फोटो

प्रतीकात्मक फोटो

मैंने अपने 70 साल के जीवन में नगर निकाय के कई चुनाव देखें हैं और अपने मताधिकार का उपयोग भी किया है। जहां तक मुझे याद है पहले एक समय वो भी था जब म्युनिसिपालिटी के चुनाव पार्टी सिंबल पर नहीं होकर वार्ड मेंबर का चुनाव मतदाता उम्मीदवार की शख्सियत और समाज-मोहल्ले में उसकी भागीदारी के आधार पर अपने प्रतिनिधि का चयन करने के लिए अपने अपने मताधिकार का उपयोग कर बतौर  पार्षद नगर पालिका में भेजते थे। 

यह भी सुना गया है कि आजादी से पहले रियासत काल में ऐसे प्रतिनिधियों का चयन स्वयं राज दरबार द्वारा किया जाता रहा था। स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र की सतत विकास प्रक्रिया के चलते ऐसे वार्ड प्रतिनिधि हेतु प्रत्येक उम्मीदवार का चुनाव चिन्ह उसकी पार्टी का नहीं होकर अलग अलग होना शुरू हुआ है। तत्पश्चात सभी विजेता पार्षद मिल कर नगर पालिका हेतु एक सभापति का चुनाव करने लगे और वो सभापति लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुवे नगर के विकास हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते थे।

बदल गई परम्पराएं 

अब वो पुराने जमाने की परम्पराएं बदल गई है और नगर निकाय के चुनाव भी पार्टी सिंबल पर होने लगे हैं, ऐसे में नगर निकाय चुनाव प्रक्रिया में भी परिवर्तन करते हुए हमारे देश के मूल प्रजातांत्रिक ढांचे के अनुरूप ही दलीय व्यवस्था संबंधित प्रावधान लागू किए जाने चाहिए। इस व्यवस्था का एक प्रत्यक्ष असर तो चुनावी खर्चों में कमी होना दिखाई देगा तो  वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक चेतना स्वच्छ, पारदर्शित और विकसित होगी।

अभी हमारे प्रदेश में संपन्न नगर निकाय चुनावों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिल जाने के बावजूद भी अल्पमत वाले पार्षदों द्वारा अपना महापौर/अध्यक्ष निर्वाचित करवाने के प्रयोजनार्थ साम दाम दंड भेद के सभी हथकंडे अपनाए गए और यत्र तत्र सभी जगहों पर ऐसे सभी अनुचित प्रयास करने संबंधित आरोप- प्रत्यारोप भी राजनीतिक दलों द्वारा एक दूसरे दल के विरुद्ध लगाए गए। कहीं कहीं ऐसे प्रयास असफल ही रहे परन्तु थे तो एक प्रकार से लोकतंत्र की जड़ों को समूल रूप से नष्ट करने वाले ही। 

मुझे नहीं पता कि राजनीतिक दलों की क्या सोच है। मेरी राय में आज बदलती परिस्थितियों में इस संबंध में हमारे देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों को गहन चिंतन-मनन व मंथन करने की आवश्यकता है। -आम जागरूक मतदाता

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह लेख प्रेस विज्ञप्ति से प्राप्त जानकारियों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के अपने विचार हैं किसी अन्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief