ईसाई कब्रिस्तान के लिए जमीन नहीं, ग्राम सभा के फैसले पर बढ़ा विवाद
ईसाई कब्रिस्तान को लेकर सुकमा के पुनपल्ली में ग्राम सभा के फैसले से विवाद बढ़ा है। 21 परिवारों के 75 सदस्यों के अंतिम संस्कार पर सवाल उठे हैं।
ग्राम पंचायत
सुकमा, छत्तीसगढ़। पुनपल्ली गांव में ईसाई कब्रिस्तान को लेकर ग्राम सभा के एक प्रस्ताव ने ईसाई समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। करीब 2,000 आबादी वाले इस गांव में 21 परिवारों के 75 सदस्य ईसाई धर्म का पालन करते हैं। प्रस्ताव के अनुसार, ईसाई धर्म मानने वाले आदिवासियों को शव दफनाने के लिए जमीन नहीं दी जाएगी। यदि यह प्रस्ताव लागू रहता है तो इन परिवारों को अंतिम संस्कार के लिए 13 किलोमीटर से अधिक दूर धोरनापाल या 40 किलोमीटर से अधिक दूर सुकमा मुख्यालय जाना पड़ सकता है। इस फैसले के बाद गांव में धार्मिक अधिकार और अंतिम संस्कार की जगह को लेकर बहस तेज हुई है। [1]
ग्राम सभा का फैसला
पुनपल्ली में 2 अक्टूबर की बैठक के दौरान ग्राम सभा ने पंचायती राज व्यवस्था के तहत अनुसूचित क्षेत्रों के लिए बने पेसा कानून का हवाला दिया। बैठक के बाद लगाए गए बोर्ड में पादरियों के प्रवेश और धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों पर रोक की बात कही गई। ग्राम सभा ने सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और सामाजिक विरासत की रक्षा को अपने फैसले का आधार बताया। ग्रामीणों का कहना है कि प्रलोभन, दबाव या अन्य माध्यमों से धर्मांतरण से पारंपरिक आदिवासी संस्कृति और सामाजिक एकता प्रभावित होती है। इसी संदर्भ में ईसाई कब्रिस्तान के लिए जमीन नहीं देने का प्रस्ताव भी सामने आया है।
यह मामला केवल पुनपल्ली तक सीमित नहीं बताया जा रहा है। जनपद सदस्य मड़कम भीमा के अनुसार, सुकमा में पुनपल्ली समेत 4 गांवों में ऐसे प्रस्ताव पारित किए जा चुके हैं। उनके मुताबिक इसकी शुरुआत कुछ महीने पहले एर्राबोर से हुई और इसके बाद पोलमपल्ली में भी ऐसा प्रस्ताव सामने आया। अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ने इस फैसले की वैधता पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि किसी भारतीय नागरिक को गांव में प्रवेश से रोका नहीं जा सकता और हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है। उनके अनुसार, ईसाई निवासी को कब्रिस्तान की जमीन से वंचित करना संवैधानिक सवाल खड़ा करता है।
कानूनी पेच
ईसाई समुदाय से जुड़े प्रतिनिधियों ने इस घटनाक्रम को सुप्रीम कोर्ट में दफन अधिकार से जुड़े मामले से जोड़ा है। जनवरी 2025 में छत्तीसगढ़ के एक मामले में 2 न्यायाधीशों की पीठ की राय अलग रही थी। न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने निजी कृषि भूमि पर दफन की अनुमति दी थी, जबकि न्यायमूर्ति एस सी शर्मा ने कहा था कि अंतिम संस्कार निर्धारित सामुदायिक कब्रिस्तान में होना चाहिए। संबंधित व्यक्ति को भारी सुरक्षा के बीच करकापाल में अंतिम संस्कार करना पड़ा था। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासी ईसाइयों के शवों को जबरन कब्र से निकालने पर अंतरिम रोक लगाई थी।
सुकमा जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी मुकुंद ठाकुर ने कहा कि पुनपल्ली ग्राम सभा की बैठक के एजेंडे में यह मुद्दा शामिल नहीं था। उन्होंने कहा कि लिखित शिकायत मिलने पर लागू नियमों के अनुसार मामले की वैधानिकता की जांच कर उचित कार्रवाई की जाएगी। दूसरी ओर, ईसाई समुदाय से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि वे ऐसे मामलों का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं और आगे अदालत का रुख करेंगे। फिलहाल ईसाई कब्रिस्तान को लेकर पुनपल्ली का प्रस्ताव सामने है, लेकिन इसकी वैधानिकता और वास्तविक क्रियान्वयन की स्थिति प्रशासनिक जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
अस्वीकरण (Disclaimer):
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