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बदलते मौसम में स्वस्थ सांसों के साथ मनाएं दीपावली- डॉ सौगत 

दीपावली और मौसम बदलाव के समय अस्थमा, सीओपीडी व सांस के मरीज रखें विशेष सावधानी। डॉ सौगत से जानें क्या करें और क्या न करें।

By अजय त्यागी
1 min read
advertisement13Aug2026%20copy.jpg प्रतीकात्मक फोटो

प्रतीकात्मक फोटो

दीपावली का त्योहार हमारे जीवन में रोशनी, उल्लास और खुशियां लेकर आता है। घर-आंगन दीपों से जगमगाते हैं और लोग परिवार तथा मित्रों के साथ त्योहार का आनंद लेते हैं। लेकिन इसी समय बदलता मौसम और पटाखों से बढ़ने वाला वायु प्रदूषण कुछ लोगों के लिए स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती भी बन सकता है। विशेष रूप से अस्थमा, सीओपीडी, एलर्जी, पुरानी खांसी तथा अन्य सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित मरीजों को दीपावली के आसपास अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।

इस विषय में बीकानेर के पीबीएम अस्पताल के श्वसन रोग के प्रोफेसर डॉ राजेन्द्र सौगत कहते हैं कि अक्टूबर-नवंबर के दौरान मौसम में बदलाव के साथ तापमान में उतार-चढ़ाव शुरू हो जाता है। सुबह और रात में ठंड बढ़ने लगती है, जबकि दिन में अपेक्षाकृत गर्मी रह सकती है। इस बदलाव के साथ वातावरण में धूल, मिट्टी, परागकण और अन्य एलर्जी पैदा करने वाले तत्व भी सांस की बीमारी वाले लोगों की परेशानी बढ़ा सकते हैं। दीपावली के दौरान पटाखों से निकलने वाला धुआं इस समस्या को और गंभीर बना सकता है।

पटाखों का धुआं फेफड़ों के लिए क्यों नुकसानदायक?

डॉ सौगत के अनुसार पटाखे जलने के बाद वातावरण में बहुत छोटे प्रदूषक कण और विभिन्न गैसें फैलती हैं। इनमें सूक्ष्म कण, विशेष रूप से PM2.5 और PM10, फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं। संवेदनशील लोगों में इनसे श्वसन मार्ग में जलन और सूजन बढ़ सकती है।

डॉ सौगत के अनुसार इसके कारण खांसी, गले में खराश, आंखों में जलन, नाक में जलन, सीने में जकड़न, सांस फूलना और सांस लेते समय घरघराहट जैसी शिकायतें हो सकती हैं। अस्थमा के मरीजों में प्रदूषण बीमारी के दौरे को ट्रिगर कर सकता है, जबकि सीओपीडी के मरीजों में सांस की तकलीफ और खांसी बढ़ सकती है।

यह समझना जरूरी है कि समस्या केवल पटाखे चलाने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती। हवा के साथ धुआं आसपास के पूरे क्षेत्र में फैलता है। इसलिए घर के बाहर पटाखे नहीं चलाने वाले व्यक्ति भी प्रदूषित हवा के संपर्क में आ सकते हैं।

मौसम परिवर्तन के दौरान भी रहें सावधान

बदलते मौसम को लेकर डॉ सौगत का कहना है कि सांस के मरीजों के लिए केवल दीपावली के दिन ही नहीं, बल्कि मौसम परिवर्तन के पूरे दौर में सावधानी जरूरी है। ठंडी हवा में अचानक जाने से कुछ मरीजों में खांसी और सांस फूलने की समस्या बढ़ सकती है। धूल और एलर्जी के कारण भी लक्षण उभर सकते हैं।

इसलिए मरीजों को अपनी नियमित दवाएं डॉक्टर की सलाह के अनुसार लेते रहना चाहिए। यदि डॉक्टर ने इनहेलर या अन्य दवा नियमित रूप से लेने की सलाह दी है तो केवल इसलिए उसे बंद नहीं करना चाहिए कि फिलहाल लक्षण कम हैं।

डॉ सौगत के अनुसार, इनहेलर को लेकर समाज में कई तरह की गलत धारणाएं भी देखने को मिलती हैं। वास्तव में उचित मरीज में डॉक्टर की सलाह से इनहेलर उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। मरीज को अपनी दवा या इनहेलर की मात्रा में बदलाव स्वयं नहीं करना चाहिए।

डॉ सौगत के अनुसार, पांच जरूरी सावधानियां

  1. पटाखों के धुएं से दूरी बनाएं- अस्थमा, सीओपीडी और अन्य सांस के मरीजों को आतिशबाजी वाले स्थानों से दूर रहना चाहिए। विशेषकर जब वातावरण में धुआं अधिक हो, तब बाहर निकलने से बचें।
  2. बाहर निकलते समय मास्क का इस्तेमाल करें- यदि बाहर जाना आवश्यक हो तो चेहरे पर अच्छी तरह फिट होने वाला, बेहतर फिल्ट्रेशन वाला मास्क उपयोग करें। मास्क धुएं और कणों से बचाव में मदद कर सकता है, हालांकि यह प्रदूषण में लंबे समय तक रहने का विकल्प नहीं है।
  3. नियमित दवाएं और इनहेलर साथ रखें- डॉक्टर द्वारा बताई गई नियमित दवाएं समय पर लें। जिन मरीजों को आवश्यकता पड़ने पर इस्तेमाल करने के लिए रिलीवर इनहेलर निर्धारित है, उसे अपने पास रखें और उसका सही उपयोग जानते हों।
  4. घर के अंदर धुआं और तेज गंध कम करें- घर में धूम्रपान बिल्कुल न करें। अगरबत्ती, धूप, मच्छर भगाने वाले धुएं वाले उत्पाद, तेज परफ्यूम और अन्य उत्तेजक पदार्थों का इस्तेमाल भी सीमित रखें और अन्य सांस में तकलीफ़ करने वाले पदार्थ का प्रयोग बंद करें 
  5. गंभीर लक्षणों को नजरअंदाज न करें- सांस बहुत अधिक फूलना, लगातार घरघराहट, बोलने में परेशानी, होंठ या चेहरा नीला पड़ना, अत्यधिक कमजोरी या भ्रम जैसी स्थिति हो तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें।

डॉ सौगत के अनुसार, घर में किन बातों का ध्यान रखें?

  • दीपावली के दौरान जब बाहर धुआं अधिक हो, तो घर के दरवाजे और खिड़कियां बंद रखना मददगार हो सकता है। हालांकि घर में पर्याप्त वेंटिलेशन भी जरूरी है, इसलिए परिस्थितियों के अनुसार ऐसे समय हवा का आवागमन रखें जब बाहर प्रदूषण अपेक्षाकृत कम हो।
  • घर में धूम्रपान करने से बचना चाहिए। केवल बाहर से आने वाला प्रदूषण ही समस्या नहीं है; घर के भीतर का धुआं भी सांस के मरीजों के लक्षणों को बढ़ा सकता है।
  • बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें। छोटे बच्चों के फेफड़े अभी विकास की अवस्था में होते हैं और बुजुर्गों में पहले से मौजूद फेफड़ों या हृदय संबंधी बीमारियां प्रदूषण के प्रभाव को बढ़ा सकती हैं।

डॉ सौगत के अनुसार, अचानक सांस फूलने लगे तो क्या करें?

  • यदि किसी मरीज को पटाखों के धुएं या प्रदूषण के संपर्क में आने के बाद अचानक सांस फूलने लगे, तो सबसे पहले उसे धुएं वाले वातावरण से दूर करें और अपेक्षाकृत स्वच्छ हवा वाली जगह पर ले जाएं। मरीज को आरामदायक स्थिति में बैठाएं और उसे शांत रखने का प्रयास करें।
  • यदि डॉक्टर ने पहले से कोई रिलीवर इनहेलर निर्धारित किया है तो उसे डॉक्टर द्वारा बताए गए तरीके और मात्रा के अनुसार इस्तेमाल करें। मरीज को बिना चिकित्सकीय सलाह के किसी अन्य दवा की अतिरिक्त खुराक नहीं देनी चाहिए।

डॉ सौगत के अनुसार, इन लक्षणों में तुरंत अस्पताल जाएं

यदि सांस की परेशानी तेजी से बढ़ रही हो, मरीज को बोलने में कठिनाई हो रही हो, वह सामान्य रूप से चल या बैठ नहीं पा रहा हो, होंठ या चेहरा नीला पड़ने लगे, अत्यधिक सुस्ती या भ्रम की स्थिति हो अथवा निर्धारित दवा से राहत न मिले, तो इसे गंभीर स्थिति मानना चाहिए। ऐसे समय घरेलू उपचार या इंतजार करने के बजाय तुरंत नजदीकी अस्पताल या आपातकालीन चिकित्सा सेवा से संपर्क करना चाहिए।

पटाखे नहीं चलाए तो दीपावली कैसी?

इस विषय में डॉ सौगत का कहना है कि हमें अपनी सोच बदलने की जरूरत है। क्योंकि- 

  • दीपावली की खुशी केवल पटाखों से नहीं है। दीपक, रंगोली, मिठाइयां, परिवार के साथ समय और जरूरतमंदों के जीवन में खुशियां बांटना भी त्योहार की खूबसूरती है।
  • यदि हमारे आसपास कोई बच्चा अस्थमा से पीड़ित है, कोई बुजुर्ग सांस की बीमारी से जूझ रहा है या कोई व्यक्ति सीओपीडी का मरीज है, तो उसके स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है।
  • पटाखों का सीमित उपयोग, कम धुआं पैदा करने वाले विकल्पों को प्राथमिकता देना और सामूहिक रूप से प्रदूषण कम करने का प्रयास करना पूरे समाज के लिए लाभकारी होगा।

डॉ सौगत की सलाह, क्या न करें?

  • सांस की तकलीफ होने पर अपनी नियमित दवा या इनहेलर अपने मन से बंद न करें।
  • अत्यधिक धुएं वाले स्थान पर खड़े होकर आतिशबाजी न देखें।
  • कमरे के अंदर पटाखे या अन्य धुआं पैदा करने वाली वस्तुएं न जलाएं।
  • सांस फूलने की गंभीर समस्या को केवल घरेलू नुस्खों से ठीक करने की कोशिश न करें।
  • किसी दूसरे व्यक्ति की दवा या इनहेलर बिना चिकित्सकीय सलाह के इस्तेमाल न करें।

डॉ सौगत का सन्देश- स्वस्थ सांसों के साथ मनाएं दीपावली

दीपावली रोशनी और खुशियों का पर्व है। हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि त्योहार की रोशनी किसी की सांसों के लिए परेशानी न बने। थोड़ी-सी सावधानी न केवल अस्थमा और सीओपीडी के मरीजों को अस्पताल जाने से बचा सकती है, बल्कि बच्चों, बुजुर्गों और स्वस्थ लोगों को भी अनावश्यक प्रदूषण से बचा सकती है।

इस दीपावली एक संकल्प लें—दीये ज्यादा जलाएं, धुआं कम करें; खुशियां ज्यादा बांटें, प्रदूषण कम करें।

स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें और दूसरों को भी स्वस्थ दीपावली मनाने का अवसर दें। यदि कोई मरीज सांस की बीमारी से पीड़ित हो तो उसे तुरंत प्रदूषण वाले इलाक़े से दूर हटाएं और हॉस्पिटल ले जाएं।

विशेष मुलाकात के अंश- डॉ राजेन्द्र सौगत 
आचार्य, श्वसन रोग, 
पीबीएम अस्पताल, बीकानेर। 

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief