100 साल पुरानी रावण वध परंपरा, धनुष बाण से निभाई जाती है रस्म
राजस्थान के रोपा गांव में रावण वध परंपरा करीब 100 साल से कायम है। यहां रावण का पुतला नहीं जलता, बल्कि स्थायी मूर्ति का प्रतीकात्मक वध होता है।
रोपा गांव में बनी रावण की प्रतिमा
रोपा (भीलवाडा), राजस्थान। भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा क्षेत्र में स्थित रोपा गांव की रावण वध परंपरा दशहरे के पारंपरिक आयोजन से अलग पहचान रखती है। देश के अधिकांश हिस्सों में विजयदशमी पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, लेकिन यहां रावण को जलाने के बजाय धनुष बाण से उसका प्रतीकात्मक वध किया जाता है। गांव के चौक में सीमेंट से बनी करीब 10 फीट ऊंची स्थायी प्रतिमा मौजूद है, जिसे लगभग 100 साल पुराना बताया जाता है। ग्रामीण हर साल दशहरे से पहले प्रतिमा की साफ सफाई और रंगाई करते हैं। इस रावण वध परंपरा को देखने के लिए आसपास के गांवों से भी लोग पहुंचते हैं। [1] [विडियो]
दो दिन का आयोजन
रोपा गांव में दशहरे का आयोजन 2 दिनों तक चलता है। पहले दिन भगवान चारभुजा नाथ मंदिर से ठाकुरजी की शोभायात्रा निकाली जाती है। ग्रामीण इसमें शामिल होकर उत्सव की शुरुआत करते हैं। इसके बाद रामायण के पात्रों का मंचन होता है और हनुमान का रूप धारण किए बाल कलाकार लंका दहन की रस्म निभाते हैं। इस कार्यक्रम का केंद्र गांव का रावण चौक रहता है। दूसरे दिन विजयदशमी पर राम की भूमिका निभाने वाला बाल कलाकार धनुष बाण लेकर रावण की स्थायी प्रतिमा के सामने पहुंचता है। फिर तीर चलाकर प्रतीकात्मक वध का मंचन किया जाता है। यही रावण वध परंपरा इस गांव को अलग पहचान देती है।
इस आयोजन में बच्चे और युवा रामायण के विभिन्न पात्रों की भूमिका निभाते हैं। राम, लक्ष्मण और हनुमान के रूप में सजे कलाकार उत्सव को धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप देते हैं। रावण चौक में मुख्य कार्यक्रम देखने के लिए आसपास के गांवों के लोग भी जुटते हैं। यहां रावण का पुतला जलाकर राख नहीं किया जाता, बल्कि स्थायी प्रतिमा को सुरक्षित रखा जाता है। ग्रामीण हर साल उसकी रंगाई करके परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। स्थानीय स्तर पर रोपा को रावण का गांव भी कहा जाता है। इस आयोजन में लंका दहन और रावण का प्रतीकात्मक वध अलग अलग दिनों में होते हैं, जिससे दशहरे का कार्यक्रम विशिष्ट बनता है।
आस्था की वजह
गांव के पंडित सत्यनारायण शर्मा के अनुसार, ग्रामीण रावण को केवल खलनायक के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसकी विद्वता का भी सम्मान करते हैं। इसी मान्यता के कारण प्रतिमा को जलाने के बजाय उसका प्रतीकात्मक वध किया जाता है। इस तरह रावण वध परंपरा में रामायण की कथा का मंचन भी होता है और रावण की स्थायी मूर्ति भी बनी रहती है। ग्रामीणों की आस्था इस प्रतिमा से जुड़ी हुई है। कुछ लोग अपनी मनोकामनाओं के लिए यहां प्रार्थना करते हैं और चढ़ावा भी चढ़ाते हैं। हालांकि, मनोकामना पूरी होने से जुड़ी बातें स्थानीय धार्मिक विश्वास हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं की गई है।
ग्रामीणों के बीच एक पुराना प्रसंग भी प्रचलित है। उनके अनुसार, किसी समय क्षेत्र में सूखे के दौरान लोगों ने रावण की प्रतिमा के पास रातभर जागकर प्रार्थना की थी और अगली सुबह बारिश हुई थी। गांव के लोग इस घटना को अपनी आस्था से जोड़कर देखते हैं। यह प्रसंग स्थानीय मान्यता के रूप में बताया जाता है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। करीब 100 साल से चली आ रही रावण वध परंपरा में आज भी स्थायी प्रतिमा की देखभाल, रामायण के पात्रों का मंचन और धनुष बाण से प्रतीकात्मक वध शामिल हैं। रोपा गांव की यह परंपरा दशहरे के विविध क्षेत्रीय स्वरूपों को सामने लाती है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
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