असम में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पारित होने के साथ ही राज्य ने अपनी विधायी यात्रा में एक बड़ा कदम उठाया है। इस ऐतिहासिक निर्णय के साथ असम इस कानून को अपनाने वाला देश का तीसरा राज्य बन गया है। इससे पहले उत्तराखंड और गुजरात ने भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इस कानून का मुख्य उद्देश्य नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुरक्षित करने का प्रयास करना है, जो संविधान के अनुच्छेद 44 की भावना के अनुरूप है।
विधानसभा सत्र की शुरुआत से ही इस विधेयक को लेकर सदन के भीतर और बाहर सियासी पारा काफी चढ़ा हुआ था। सत्ता पक्ष का स्पष्ट मानना है कि सरकार ने जनता से किए गए अपने सबसे बड़े चुनावी वादे को निभाया है। वहीं दूसरी ओर, विपक्ष ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए मांग की थी कि विधेयक को पहले एक चयन समिति के पास भेजा जाना चाहिए था। कानून के सामाजिक प्रभाव को लेकर विपक्षी दलों ने सदन में कड़ा विरोध दर्ज कराया।[1]
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने स्पष्ट किया है कि असम में समान नागरिक संहिता विधेयक असम की सामाजिक संरचना और विशिष्ट जनसांख्यिकीय विविधता को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इस कानून में मुख्य रूप से न्यूनतम आयु, बहुविवाह पर प्रतिबंध और माता-पिता की संपत्ति में बेटियों को समान अधिकार देने जैसे प्रावधान शामिल हैं। इसके अलावा, लिव-इन रिलेशनशिप से संबंधित मामलों को भी इस विधेयक के दायरे में लाया गया है।
"यह विधेयक असम की सामाजिक संरचना और विशिष्ट जनसांख्यिकीय विविधता को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है," मुख्यमंत्री सरमा ने सदन में जानकारी दी।
राज्य सरकार का मानना है कि इन बदलावों से समाज में समानता और पारदर्शिता आएगी। उत्तराखंड का उदाहरण देते हुए सरकार ने तर्क दिया है कि समान नागरिक संहिता के माध्यम से महिलाओं को न केवल अधिक कानूनी सुरक्षा प्राप्त होती है, बल्कि समाज का सशक्तिकरण भी सुनिश्चित होता है। राज्य प्रशासन का जोर इस बात पर है कि यह कानून किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि सभी के हितों की रक्षा के लिए लाया गया है।
असम से पूर्व उत्तराखंड और गुजरात ने भी इसी राह को अपनाया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने राज्य में इसके सफल क्रियान्वयन की सराहना करते हुए कहा कि इसने महिलाओं की सुरक्षा में वृद्धि की है। उत्तराखंड के आंकड़ों के अनुसार, वहां महज एक साल में 4,74,447 विवाह ऑनलाइन पंजीकृत किए गए हैं, जो जनता के बढ़ते विश्वास को दर्शाता है। इसी प्रकार, गुजरात ने भी मार्च में इसे समानता का माध्यम बताते हुए पारित किया था।
असम की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए, मुख्यमंत्री ने जोर दिया है कि यह कानून भविष्य की जरूरतों के अनुसार बदलाव लाता है। जहां एक ओर विपक्ष इसे लाने के समय पर सवाल उठा रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि यह एक प्रगतिशील कदम है। अंततः, असम में समान नागरिक संहिता लागू होना राज्य की सामाजिक व्यवस्था में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए प्रकाशित किया गया है। कानूनी पहलुओं, सरकारी नीतियों या अधिनियमों के संबंध में कोई भी निर्णय लेने से पहले आधिकारिक राजपत्र या विशेषज्ञों से परामर्श लें। लेखक, प्रकाशक एवं संपादक इस सामग्री के उपयोग से होने वाली किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष क्षति के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।
Author:अजय त्यागी
May 27, 2026: 5:18 PM
© 2026 Rex TV India
Contact @ 91 6376887816 | rextvindia@gmail.com