नाव हादसा और प्रशासनिक लापरवाही का एक और दुखद अध्याय बिहार के समस्तीपुर में तब लिखा गया, जब गुरुवार की सुबह एक नाव ने कई परिवारों की खुशियां डुबो दीं। सुबह करीब 5:45 बजे हुई इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हमारे प्रशासनिक तंत्र के लिए मानवीय जीवन की कीमत कितनी कम है। सुल्तानपुर दियारा से लौटते वक्त 14 लोगों से भरी नाव का पलटना महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की उन तमाम खामियों का नतीजा है, जिन्हें हर बार नजरअंदाज कर दिया जाता है।[1]
तेज हवाओं का बहाना बनाकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेने में माहिर है। पटना जिला प्रशासन द्वारा जारी किया गया औपचारिक बयान महज एक कागजी खानापूर्ति है, जिसमें उन पांच लोगों का कहीं कोई अता-पता नहीं है जो अब भी लापता हैं। क्या तेज हवाएं आने की चेतावनी पहले नहीं दी जा सकती थी? या फिर सुरक्षा के इंतजाम केवल सरकारी फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए होते हैं?
घटनास्थल पर मौजूद ग्रामीणों के अनुसार, नाव की स्थिति पहले से ही जर्जर थी, लेकिन सुरक्षा मापदंडों को ताक पर रखकर उसे नदी में उतार दिया गया। प्रशासन की नाक के नीचे चल रहे इस मौत के खेल पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं है। सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है, और जब हादसे होते हैं, तब अधिकारी केवल सांत्वना देने और मुआवजे के चेक बांटने पहुंचते हैं।
इस व्यवस्था पर चोट करते हुए स्थानीय लोगों ने कहा, "नाव हादसा और प्रशासनिक लापरवाही का यह कोई पहला मामला नहीं है।" हर बार हादसे के बाद जांच कमेटियां बनती हैं, वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत जस की तस बनी रहती है। आखिर कब तक गरीब जनता अपनी जान को जोखिम में डालकर नदी पार करने को मजबूर रहेगी?
बिहार: पटना जिले के बरह उपमंडल में उमानाथ गंगा घाट के पास गंगा नदी में एक नाव पलटने से कई लोगों के मारे जाने की आशंका है
— Journalist Ravendra kumar (@Chhotukingoffi1) May 28, 2026
एक प्रत्यक्षदर्शी का कहना है,"नाव में लगभग 14 से 15 लोग सवार थे। करीब सात लोगों के डूबने की आशंका है। अन्य लोगों को दूसरी नाव की मदद से बचा लिया गया। #bihar pic.twitter.com/atLwfkMLgj
पटना जिला प्रशासन का आधिकारिक बयान यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि नाव तेज हवा के कारण पलटी। इस बयान में एक अजीब सी संवेदनहीनता है। क्या प्रशासन का काम केवल आंकड़ों में मौत दर्ज करना है? लापता पांच लोगों को ढूंढने के लिए किए जा रहे प्रयासों पर सवाल उठना लाजिमी है, क्योंकि शुरुआती घंटों की देरी अक्सर अपनों को हमेशा के लिए दूर कर देती है।
अधिकारियों को यह समझना होगा कि फाइलों में दर्ज की गई 'बचाव अभियान' की रिपोर्ट से किसी के घर का चिराग वापस नहीं आता। नाव हादसा और प्रशासनिक लापरवाही के ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करने का दौर कब शुरू होगा? क्या किसी जिम्मेदार अधिकारी पर कोई कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी पुरानी फाइलों के ढेर में कहीं दफन हो जाएगा?
नदी के उस पार की दुनिया से वापस लौटते वक्त ये लोग उम्मीदें लेकर आए थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि बीच मझधार में सिस्टम की लापरवाही उनका इंतजार कर रही है। नाव में सवार 14 लोगों का आंकड़ा यह बताता है कि क्षमता से अधिक भार लादने की अनुमति किसने दी? अगर प्रशासन की आंखें खुली होतीं, तो शायद आज ये दो जानें बच सकती थीं और पांच परिवारों का दर्द कम होता।
अंत में, सवाल यही है कि क्या हम ऐसे ही हादसे देखकर आगे बढ़ते रहेंगे? बिहार में नाव हादसा और प्रशासनिक लापरवाही की पुनरावृत्ति यह दर्शाती है कि हमारा तंत्र न तो सीखता है और न ही सुधरना चाहता है। जब तक सुरक्षा के ठोस इंतजाम और जिम्मेदारी का अहसास नहीं होगा, तब तक नदियों में ऐसी लाशें तैरती रहेंगी और व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी का ठीकरा 'तेज हवाओं' पर फोड़ती रहेगी।
यह लेख एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट है जो समाचार तथ्यों पर आधारित है। इसमें लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी प्रकार की आधिकारिक जांच या कानूनी कार्यवाही के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखते हैं। पाठक सामान्य जानकारी के लिए इसे पढ़ें।
Author:अजय त्यागी
May 28, 2026: 10:58 AM
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