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Rex TV India
Latest News समीक्षा Digital Newsletter 01 Jun 2026 · 9:33 PM

गेहूं की खेती पर जलवायु परिवर्तन: किसानों की मेहनत पर फिर रहा पानी

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

नई दिल्ली। गेहूं की खेती पर जलवायु परिवर्तन का साया अब केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत बनकर सामने आया है। क्लाइमेट ट्रेंड्स की ताजा रिपोर्ट ‘व्हीट अंडर स्ट्रेस’ ने उन दावों की हवा निकाल दी है जो अक्सर सरकारी मंचों से 'अन्नदाता' की खुशहाली को लेकर किए जाते हैं। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में प्रति दशक 0.5 डिग्री सेल्सियस तापमान में वृद्धि और फरवरी में 0.69 डिग्री की उछाल सीधे तौर पर देश की खाद्य सुरक्षा के लिए अलार्म है। जब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश अपनी 107 मिलियन टन की उपज को सुरक्षित रखने में संघर्ष कर रहा हो, तो सरकारी दावे केवल फाइलों तक ही सीमित रह जाते हैं।[1]

बढ़ती गर्मी का असर

रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि केवल दिन की गर्मी ही नहीं, बल्कि रात के बढ़ते तापमान ने गेहूं की फसल को 'थकान' की स्थिति में डाल दिया है। गुजरात में रात का तापमान दिन की तुलना में तीन गुना तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ती रात की गर्मी के कारण पौधों का श्वसन दर (respiration) बढ़ जाता है, जिससे अनाज भरने के चरण में उन्हें मिलने वाली ऊर्जा खत्म हो जाती है। यह उन नीतियों पर एक तीखा कटाक्ष है जो विकास के नाम पर कंक्रीट के जंगल तो बढ़ा रही हैं, लेकिन पर्यावरण के संतुलन को सहेजने में पूरी तरह नाकाम रही हैं।

"बढ़ती रात की गर्मी के कारण पौधे अनाज भरने की प्रक्रिया में ऊर्जा लगाने के बजाय अपनी कार्बोहाइड्रेट ऊर्जा को श्वसन में खर्च कर रहे हैं, जिससे फसल समय से पहले परिपक्व होकर दम तोड़ रही है।" - डॉ. पलक बालियान, शोध प्रमुख, क्लाइमेट ट्रेंड्स।

किसान राम सिंह जैसे सीमांत किसान, जो अब कृषि छोड़ने पर मजबूर हैं, यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि जमीन पर स्थिति कितनी भयानक है। अक्टूबर की गर्मी में बीज का अंकुरित न होना और फरवरी-मार्च की अचानक गर्मी से दानों का सुकड़ जाना, यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक मानवीय भूलों का परिणाम है। यदि आज भी हमने अपनी कृषि पद्धतियों को नहीं बदला, तो आने वाले समय में रोटी का संकट महज एक खबर नहीं, बल्कि एक सामाजिक त्रासदी होगा।

मिट्टी की घटती उर्वरकता 

गेहूं की खेती पर जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ हमारी मिट्टी का बिगड़ता स्वास्थ्य भी एक बड़ा कारण है। उमेंद्र दत्त, खेति विरासत मिशन के कार्यकारी निदेशक, ने इसे सीधे तौर पर दशकों की रसायनों पर आधारित खेती का परिणाम बताया है। हमने अपनी मिट्टी की जीवंत शक्ति को खत्म कर दिया है, जिससे फसलें छोटी-छोटी जलवायु परिवर्तनों के प्रति भी बहुत संवेदनशील हो गई हैं। यह उन कृषि नीतियों पर भी कटाक्ष है जो केवल पैदावार बढ़ाने के पीछे भागती रहीं, लेकिन कभी यह नहीं सोचा कि भविष्य में मिट्टी की उर्वरता का क्या होगा।

"मिट्टी के स्वास्थ्य और पारिस्थितिक असंतुलन की उपेक्षा का ही परिणाम है कि गेहूं जैसी फसल आज इतनी कमजोर हो गई है।" - उमेंद्र दत्त, खेति विरासत मिशन।

केवल एमएसपी (MSP) की राजनीति में उलझे रहने से देश का पेट नहीं भरेगा। प्रो. सुरेंद्र कुमार ढाका का कहना है कि जलवायु पैटर्न में आए बदलावों के कारण अब कटाई के समय असामयिक बारिश और नमी बढ़ना आम हो गया है, जो अनाज में फफूंद पैदा कर रहा है। सरकार को अब कागजी सलाहों से आगे बढ़कर मिट्टी को पुनर्जीवित करने वाली टिकाऊ खेती की ओर संसाधनों को मोड़ना होगा।

सुधार की सख्त जरूरत

गेहूं की खेती पर जलवायु परिवर्तन ने दिखा दिया है कि वर्तमान कृषि मॉडल अपनी उपयोगिता खो चुका है। जब तक किसान को जलवायु-अनुकूल खेती के लिए ठोस प्रोत्साहन और नीतिगत समर्थन नहीं मिलेगा, तब तक आत्मनिर्भरता के नारे खोखले साबित होंगे। किसानों को देसी बीज, मल्चिंग और प्राकृतिक खेती के लिए प्रोत्साहित करना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता बन चुका है।

बहरहाल, खाद्य सुरक्षा के लिए केवल थोड़े बहुत बदलाव काफी नहीं हैं, बल्कि कृषि के पूरे प्रतिमान को बदलना होगा। यदि हम आने वाली पीढ़ियों को गेहूं के खेतों और पर्याप्त अनाज की सुरक्षा देना चाहते हैं, तो हमें आज की रसायनों और अत्यधिक इनपुट वाली खेती से निकलकर एक मिट्टी-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना ही होगा, वरना गेहूं की खेती पर जलवायु परिवर्तन का यह संकट हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ को तोड़कर रख देगा।

Rex TV India Author:अजय त्यागी June 1, 2026: 9:33 PM © 2026 Rex TV India Contact @ 91 6376887816 | rextvindia@gmail.com
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