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Rex TV India
Latest News समीक्षा Digital Newsletter 09 Jun 2026 · 7:16 PM

आम आदमी होना बहुत मुश्किल है, अफसरों को कौन समझाए- मनोहर चावला 

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

आम आदमी होना बहुत मुश्किल है। यह कोई साहित्यिक पंक्ति नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की रोजमर्रा की हकीकत है जो टूटी सड़कों पर चलता है, अवैध अतिक्रमणों के बीच सांस लेता है, रातभर शोर सहता है और फिर भी उम्मीद करता है कि शायद किसी दिन उसकी समस्या किसी जिम्मेदार व्यक्ति के कानों तक पहुंच जाएगी। दुर्भाग्य यह है कि जिन तक यह आवाज पहुंचनी चाहिए, उनके आसपास ऐसी कोई समस्या पहुंच ही नहीं पाती।

बुजुर्ग बताते हैं कि कभी महाराजा गंगासिंह जनता का हाल जानने के लिए वेश बदलकर निकल पड़ते थे। वे समझते थे कि दरबार में पहुंचने वाली जानकारी और जमीन पर मौजूद सच्चाई में फर्क होता है। लोकतंत्र में जनता के सेवक पहले से ज्यादा हैं, सुविधाएं पहले से ज्यादा हैं, लेकिन आम आदमी का दर्द समझने का समय शायद पहले से कम हो गया है।

दर्द की असली पहचान

कहा जाता है कि घायल की गति घायल ही जाने। दांत का दर्द कैसा होता है, यह वही बता सकता है जिसके दांत में दर्द हुआ हो। इसी तरह आम आदमी की परेशानी वही समझ सकता है जिसने उसे भोगा हो। एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर समस्याओं की फाइलें पढ़ी जा सकती हैं, लेकिन उनकी टीस महसूस नहीं की जा सकती।

कल्पना कीजिए कि किसी बड़े अधिकारी या नेता के बंगले के मुख्य द्वार पर कोई अज्ञात कार खड़ी कर जाए और फिर गायब हो जाए। न उनकी गाड़ी बाहर निकल सके और न अंदर जा सके। पुलिस फोन उठाए नहीं और जिम्मेदार विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहें। शायद तब पहली बार महसूस होगा कि आम नागरिक छोटी-छोटी समस्याओं में कितना बड़ा तनाव झेलता है।

रात की बेचैनी

कल्पना कीजिए कि किसी रात किसी बड़े अधिकारी की नींद तेज डीजे की आवाज से खुल जाए। बाहर लोग जश्न मना रहे हों, लाउडस्पीकर पूरी क्षमता से गरज रहा हो और आसपास कुछ लोग दीवारों को सार्वजनिक शौचालय समझ रहे हों। शिकायत करें तो कार्रवाई नहीं, और न करें तो नींद नहीं।

लेकिन ऐसा होना मुश्किल है। जिन इलाकों में सत्ता और प्रशासन निवास करते हैं, वहां नियम अक्सर समय पर पहुंच जाते हैं। परेशानी वहां पहुंचने से पहले ही रास्ता बदल लेती है। परेशानी को भी शायद पता है कि उसका स्थायी पता आम आदमी का घर ही है।

रिहायशी इलाकों का हाल

मान लीजिए किसी बड़े अधिकारी की कोठी के सामने अचानक कोचिंग सेंटर खुल जाए। उसके पास ढाबा खुल जाए। फिर फास्ट फूड सेंटर, हॉस्टल, पीजी और घंटे के हिसाब से कमरे देने वाले होटल भी आ जाएं। पार्किंग सड़क पर होने लगे, भीड़ बढ़ने लगे और रात तक शोर बना रहे। तब शायद समझ आए कि रिहायशी क्षेत्र में अव्यवस्थित व्यावसायिक गतिविधियां कितनी बड़ी मानसिक यातना बन जाती हैं।

आम आदमी होना बहुत मुश्किल है क्योंकि वह रोज ऐसे माहौल में जीता है। उसके घर के सामने सड़क खोद दी जाती है। कहीं स्पीड ब्रेकर कमर तोड़ते हैं, कहीं लावारिस कुत्ते रातभर भौंकते हैं। कहीं पानी आधे घंटे आता है तो कहीं बिजली बार-बार चली जाती है। लेकिन जिनके बंगले जगमगाते रहते हैं, उन्हें इन समस्याओं का अनुभव कैसे होगा?

पवनपुरी की पीड़ा

यदि प्रशासन वास्तव में जमीनी हकीकत देखना चाहता है तो मेडिकल कॉलेज से नागाणीजी मंदिर तक एक चक्कर लगा सकता है। खासकर पवनपुरी सेक्टर-1 में, जहाँ अनेक मकानों का स्वरूप बदल चुका है। घर धीरे-धीरे दुकानों में बदल गए हैं और रिहायशी कॉलोनी का चरित्र लगातार प्रभावित हो रहा है।

शराब की दुकानें, निजी अस्पताल, मेडिकल स्टोर, लैब, कोचिंग सेंटर और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां ऐसे फैलती चली गईं जैसे किसी ने नक्शे से रिहायशी क्षेत्र की परिभाषा ही मिटा दी हो। पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। यातायात दबाव बढ़ रहा है और स्थानीय निवासी लगातार असुविधा झेल रहे हैं। लेकिन फाइलों में शायद सब कुछ व्यवस्थित दिखाई देता होगा।

प्राथमिकताएं अलग-अलग

समस्या यह नहीं कि प्रशासन को अधिकार नहीं हैं। समस्या यह है कि प्राथमिकताएं अलग दिखाई देती हैं। जनता की चिंता रोजमर्रा की है, जबकि व्यवस्था की चिंता अक्सर कागजों तक सीमित रह जाती है। दोनों के बीच संवाद का पुल कहीं अधूरा नजर आता है।

शिकायत करना भी अपने आप में एक परीक्षा बन चुका है। शिकायत करो तो दुसरे पक्ष से भी शिकायत मंगा ली जाती है और शुरू हो जाता है समझाइश का दौर। व्यर्थ में समय खराब होता है। कागजी प्रक्रिया चलती है, तनाव बढ़ता है। अंततः जबरन समझौता करवा दिया जाता है और अंत में समस्या वहीं खड़ी रहती है जहां पहले दिन थी। फर्क सिर्फ इतना होता है कि शिकायतकर्ता का धैर्य थोड़ा और कम हो जाता है।

उम्मीद अभी बाकी है

आम आदमी होना बहुत मुश्किल है, लेकिन इसके बावजूद आम आदमी उम्मीद नहीं छोड़ता। वह हर नए अधिकारी से, हर नई व्यवस्था से और हर नई घोषणा से यह अपेक्षा करता है कि शायद इस बार उसकी आवाज सुनी जाएगी। शायद इस बार फाइलों से बाहर निकलकर जमीनी सच्चाई देखी जाएगी।

प्रशासन और जनता के बीच दूरी कम करने का सबसे आसान तरीका यही है कि समस्याओं को रिपोर्टों में नहीं, वास्तविक रूप में देखा जाए। क्योंकि जिस दिन जिम्मेदार लोग आम नागरिक की एक दिन की जिंदगी जी लेंगे, उस दिन शायद शिकायतों की संख्या भी घटेगी और समाधान की गति भी बढ़ेगी। तब तक यही कहना पड़ेगा कि आम आदमी होना बहुत मुश्किल है।

Rex TV India Author:अजय त्यागी June 9, 2026: 7:16 PM © 2026 Rex TV India Contact @ 91 6376887816 | rextvindia@gmail.com
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