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Rex TV India
Latest News आम सूचना Digital Newsletter 20 Jun 2026 · 4:33 PM

समीक्षा के दायरे में कानून, अरेस्ट मेमो नियम की उलझन पर मंगाया सुझाव

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

मुंबई, महाराष्ट्र। देश में अंग्रेजों के जमाने के पुराने आईपीसी और सीआरपीसी के स्थान पर नए कानून भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता को लागू हुए लगभग दो साल पूरे हो रहे हैं। अमर उजाला की एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार अब इन कानूनों का विस्तृत रिव्यू कर रही है, जिसके तहत देश भर की विभिन्न जांच एजेंसियों से महत्वपूर्ण सुझाव मांगे गए हैं। इसी क्रम में महाराष्ट्र के डीजीपी कार्यालय के माध्यम से मुंबई सहित पूरे राज्य की पुलिस को एक समीक्षा सूची भेजी गई है, जिसमें पुलिस अधिकारियों ने नए अरेस्ट मेमो नियम की उलझन को सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या के रूप में रेखांकित किया है। [1]

व्यावहारिक पेंच और चुनौतियां

अमर उजाला की एक रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई पुलिस के सीनियर इंस्पेक्टरों और जांच यूनिटों को जॉइंट सीपी लॉ एंड ऑर्डर की तरफ से इस संबंध में पत्र प्राप्त हुए थे, जिनके जवाब भेज दिए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि नए कानूनों में कई खूबियां होने के बावजूद तत्काल अरेस्ट मेमो तैयार करने की अनिवार्यता बड़ी बाधा बन रही है। नए नियमों के मुताबिक आरोपी को उसकी समझ की भाषा में ही लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध कराना आवश्यक है। इस नए अरेस्ट मेमो नियम की उलझन की वजह से जमीनी स्तर पर पुलिस के लिए काम करना काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है।

पुराने कानूनों के विपरीत, अब हिरासत में लेते ही पुलिस के लिए तुरंत अरेस्ट मेमो तैयार करना बेहद अनिवार्य है, जिसमें गिरफ्तारी की तारीख, समय, स्थान और गिरफ्तारी के स्पष्ट कारणों के साथ अधिकारी का पूरा विवरण होना चाहिए। इसके अलावा इस पर आरोपी के साथ-साथ उसके परिवार के सदस्य या स्थानीय सम्मानित व्यक्ति के हस्ताक्षर लेना भी आवश्यक है। इसी भाषाई अनिवार्यता और नए अरेस्ट मेमो नियम की उलझन की कानूनी पेचीदगियों के कारण हाल ही में नागपुर में मर्डर केस के एक हिंदी भाषी आरोपी को कोर्ट ने सिर्फ इसलिए जमानत दे दी थी क्योंकि उसे मराठी में अरेस्ट मेमो दिया गया था।

"पुराने कानूनों के तहत महाराष्ट्र में हम अंग्रेजी और मराठी के दो फॉर्म रखते थे और आरोपी से भरवाकर हस्ताक्षर ले लेते थे। नए प्रावधानों के तहत हजारों मुकदमों में हर आरोपी को उसकी विशिष्ट भाषा में तत्काल अनुवादित दस्तावेज देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।" : रमेश महाले, मुख्य जांच अधिकारी (26/11 मुंबई हमला केस)

संशोधन और विशेषज्ञों के तर्क

नागपुर के मामले में हालांकि जांच अधिकारी ने बाद में आरोपी के स्कूल से दसवीं की मार्कशीट निकालकर कोर्ट में पेश की, जिसमें वह मराठी में पास था, तब जाकर पुलिस को दोबारा कस्टडी मिल सकी। लेकिन इस घटना ने कानूनी प्रावधानों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि यद्यपि इस आधुनिक युग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से अनुवाद की बात कही जा सकती है, लेकिन नए अरेस्ट मेमो नियम की उलझन के बीच एआई पर शत-प्रतिशत भरोसा नहीं किया जा सकता और न ही कानून में इसका कोई स्पष्ट उल्लेख है।

कानूनी जानकारों के अनुसार, मीसा, एनएसए और एमपीडीए जैसे कड़े कानूनों में आरोपी की भाषा में सभी कागजात का अनुवाद करके देने की व्यवस्था पहले से थी, लेकिन वे मामले सालों में एकाध बार आते हैं। वर्तमान में हर रोज दर्ज होने वाले हजारों मुकदमों में तत्काल किसी आधिकारिक अनुवादक को ढूंढना पुलिस के लिए असंभव है। केंद्र सरकार को भेजे गए सुझावों में इस भाषाई और समय सीमा की बाध्यता में ढील देने की मांग की गई है, ताकि इस नए अरेस्ट मेमो नियम की उलझन को सुधारा जा सके और अपराधी तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर कानून से बच न सकें।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसी एवं स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के कानूनी प्रावधानों, पुलिस नियमावली और न्यायालयों के नवीनतम फैसलों से संबंधित किसी भी प्रामाणिक विवरण के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय एवं संबंधित कानूनी प्राधिकरणों द्वारा जारी आधिकारिक राजपत्र को ही अंतिम आधार मानें। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।

Rex TV India Author:अजय त्यागी June 20, 2026: 4:33 PM © 2026 Rex TV India Contact @ 91 6376887816 | rextvindia@gmail.com
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