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Rex TV India
Latest News राजस्थान Digital Newsletter 27 Jun 2026 · 9:28 PM

भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास: लिखित से बेहतर कहानी कहती हैं मौन वस्तुएं

मासिक संवाद में बोलते नीतिन गोयल

बीकानेर, राजस्थान। अजित फाउण्डेशन द्वारा आयोजित मासिक संवाद के अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में अतीत की प्रतिध्वनियां: भारतीय उपमहाद्वीप की भौतिक संस्कृति विषय पर अपनी बात रखते हुए इतिहासवेता डॉ. नीतिन गोयल ने कहा कि इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं होता। इतिहास उन साधारण वस्तुओं में भी जीवित रहता है जिन्हें हम प्रतिदिन देखते हैं, छूते हैं और जिनका उपयोग करते हैं। उन्होंने अपने उद्बोधन में सुदेषना गुहा की कृति ए हिस्ट्री ऑफ इण्डिया थ्रू 75 ऑब्जेक्ट के केन्द्र में रखते हुए यह बात कही। इस संवाद में उन्होंने भौतिक वस्तुओं के महत्व को बहुत ही सुंदर ढंग से समझाया।

"मौन वस्तुएँ, लिखित इतिहास से कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से अतीत की कहानी कहती हैं।" — डॉ. नीतिन गोयल, इतिहासवेता

यह किताब गहराई से यह मूल्यांकित करती है कि वस्तुएँ चाहे प्रामाणिक हों या प्रतिकृति या प्रतिनिधित्व के माध्यम से प्रदर्शित हों, उनके शक्तिशाली भौतिक स्वरूप और अर्थ में बदलाव के साथ जुड़ना, इतिहास के अध्ययन में कितना महत्वपूर्ण है। इस पुस्तक की सबसे अनोखी बात यह है कि साधारण वस्तुएं अक्सर ऐतिहासिक स्रोत बन जाती हैं और यह पुस्तक पाठक को यह देखने का मार्गदर्शन देती है कि इतिहास स्थिर नहीं है बल्कि हमेशा निर्माण में होता है। इस तरह भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास परखा जाता है।

कला और संस्कृति

उन्होंने पुस्तक में सम्मिलित 75 ऑब्जेक्ट में से मुख्य ऑब्जेक्ट के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि इसमें फड़ चित्रशैली, एमबस्ट्र कार, गोदरेज ताला, एल.आई.सी सिम्बल, कावड़ शैली, अमूल गर्ल आदि कई ऐसी वस्तुएं ली गई है जोकि हमारे जीवन की दिनचर्या में शामिल हुआ करती थी। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए शिक्षाविद् डॉ. अशोक शर्मा ने कहा कि हमें फड़ चित्रकला को आगे बढ़ाना चाहिए। जिससे लुप्त हो रही हमारी लोककलाओं का पुनरूत्थान होगा। उन्होंने युवा-युवतियों को संबोधित करते हुए कहा कि इतिहास हमें जीवन में वह सबकुछ सीखाता है।

भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास वह ज्ञान है जिसे हमारे पूर्वजों ने जिया और हमारे लिए छोड़ा। हमें इतिहास का अध्ययन करते हुए नवीन प्रयासों की तरह निरन्तर बढ़ते रहना चाहिए। कार्यक्रम के अगले चरण में फड़ चित्रकला कार्यशाला के समापन समारोह में मुख्य अतिथि वरिष्ठ चित्रकार डॉ. राकेश किराड़ू ने अपनी बात रखते हुए कहा कि चाहे कोई भी कला हो उसको सीमाएं बांध नहीं सकती है। संगीत हो या लोक कला उसका कैनवास पूरा विश्व होता है। कला बंधन को तोड़ती है और व्यक्तियों को जोड़ने का कार्य करती है। कला ही एक ऐसा माध्यम है जहां हम अपनी अभिव्यक्ति को मुखरित कर सकते है।

संस्था का प्रयास

उसका साधन शब्द या चित्र हो सकते है। संस्था समन्वयक संजय श्रीमाली ने कहा कि हमें अपनी लुप्त हो रही चित्रशैलियों पर कार्य करना आवश्यक है। लोक कलाओं को जीवित रखने हेतु इस प्रकार की कार्यशालाओं का निरन्तर आयोजन किया जाए तो नए कलाकार तैयार होगें तथा उनको एक मंच मिलेगा। कार्यक्रम के अंत में शिक्षाविद् विजयशंकर आचार्य ने सभी आगुन्तुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया। मंचस्थ विद्वजनों द्वारा कार्यशाला में हिस्सा लेने वाले सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास सहेजने पर कार्य हुआ।

कार्यक्रम में नदीम अहमद नदीम, अरमान नदीम, हनीफ उस्ता, गिरिराज पारीक, मौहम्मद फारूक, सुनीता श्रीमाली, उषा बिस्सा, शिव दाधीच, बाबूलाल, गौरीशंकर शर्मा सहित कई युवा-युवतियां उपस्थित रहे। सभी उपस्थित जनों ने इतिहास को भौतिक वस्तुओं के चश्मे से देखने के इस नवीन दृष्टिकोण की काफी सराहना की। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि आने वाली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने के लिए ऐसे बौद्धिक विमर्श और व्यावहारिक कार्यशालाएं बहुत आवश्यक हैं। प्रतिभागियों ने इस आयोजन को ज्ञानवर्धक बताते हुए लोक कलाओं के संरक्षण का संकल्प लिया।

प्रदर्शनी की सार्थकता

कला की इस कार्यशाला के माध्यम से युवाओं को प्राचीन फड़ चित्रकला के विविध आयामों को प्रत्यक्ष रूप से समझने और उसे कैनवास पर उतारने का बेहतरीन अवसर मिला। जानकारों का मानना है कि जब तक युवा वर्ग इन पारंपरिक कलाओं को आजीविका और सम्मान से नहीं जोड़ेगा, तब तक इनका पूर्ण पुनरुद्धार संभव नहीं है। इस तरह के सामूहिक प्रयास निश्चित रूप से समाज में एक सकारात्मक सांस्कृतिक चेतना का निर्माण करते हैं। यह आयोजन प्राचीन धरोहरों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक प्रभावी जरिया बनकर सामने आया है।

इतिहास और कला के इस अनूठे संगम ने दर्शकों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। भविष्य में भी ऐसी गतिविधियों को निरंतर जारी रखने पर सहमति बनी ताकि बीकानेर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दिलाई जा सके। समापन सत्र में सम्मानित हुए युवा कलाकारों के चेहरों पर अपनी संस्कृति को सीखने का गौरव साफ दिखाई दे रहा था। इस पूरी चर्चा का मुख्य संदेश यही रहा कि हमें लिखित दस्तावेजों के साथ-साथ अपने आस-पास बिखरी भौतिक वस्तुओं में भी भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास तलाशना चाहिए।

अस्वीकरण (Disclaimer): 

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। ऐतिहासिक तथ्यों, कला विधाओं और पुस्तकों के संदर्भ में पाठकों को संबंधित इतिहासकारों, अधिकृत प्रकाशकों और अकादमिक संस्थानों द्वारा जारी प्रामाणिक विवरणों को ही मुख्य आधार मानना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।

Rex TV India Author:अजय त्यागी June 27, 2026: 9:28 PM © 2026 Rex TV India Contact @ 91 6376887816 | rextvindia@gmail.com
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