रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड। विश्व के सबसे ऊंचे शिव मंदिर के रूप में प्रसिद्ध प्राचीन तुंगनाथ मंदिर को सुरक्षित रखने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया गया है। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान रूड़की ने इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने की जिम्मेदारी संभाली है। लगभग एक हजार वर्ष पुराने इस मंदिर के ढांचे में समय बीतने और प्राकृतिक आपदाओं के कारण करीब पांच से छह डिग्री का झुकाव देखा गया था। इस समस्या के समाधान के लिए सीबरी के वैज्ञानिकों द्वारा तुंगनाथ का संरक्षण आधुनिक और अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से किया जा रहा है। [1]
इस ऐतिहासिक प्राचीन धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण के बाद अब धरातल पर काम शुरू कर दिया गया है। वैज्ञानिकों की पांच सदस्यीय टीम इस संवेदनशील परियोजना को सुरक्षित ढंग से पूरा करने के लिए लगातार तकनीकी परीक्षण कर रही है। मंदिर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को देखते हुए वैज्ञानिक बहुत सावधानी से आगे बढ़ रहे हैं ताकि सदियों पुराने पत्थरों को कोई नुकसान न पहुंचे और आने वाली पीढ़ियां भी इस अद्भुत धरोहर के दर्शन कर सकें।
सीबरी के वैज्ञानिकों ने मंदिर की मूल वास्तुकला को प्रभावित किए बिना इसकी संरचनात्मक शक्ति को बढ़ाने के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है। इस अभियान की मुख्य विशेषता यह है कि मंदिर का मूल स्वरूप और धार्मिक महत्व पूरी तरह अपरिवर्तित रहेगा। विशेषज्ञ इंजीनियर नींव की मजबूती और पत्थरों की स्थिति का गहन विश्लेषण करने के बाद इसे स्थिरता प्रदान करेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में डिजिटल मॉनिटरिंग और तकनीकी परीक्षणों का उपयोग किया जा रहा है ताकि तुंगनाथ का संरक्षण पूरी सुरक्षा और प्रभावशीलता के साथ संपन्न हो सके।
इस ऐतिहासिक मंदिर को बचाने के लिए पांच सदस्यीय वैज्ञानिक टीम का गठन किया गया है जो अपनी देखरेख में कार्य कर रही है। सीबरी के निदेशक ने बताया कि इस प्रक्रिया के तहत मंदिर के पत्थरों को एक एक करके अलग किया जाएगा ताकि उन पर जमी काई को साफ किया जा सके। इस दौरान कोडिंग प्रणाली का उपयोग करके हर पत्थर की सटीक स्थिति का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। इसके बाद जमीन की स्थिरता का आकलन करके सभी पत्थरों को उनकी मूल जगह पर पुनस्र्थापित किया जाएगा।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि मुख्य मंदिर का ढांचा पांच से छह डिग्री तक झुक गया है जबकि परिसर के अन्य छोटे ढांचे दस डिग्री तक झुक चुके हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया है और इसके बचाव के प्रयास तेज कर दिए हैं। यही वजह है कि यह अभियान केवल एक इमारत को बचाना नहीं है बल्कि भारत की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत और सनातन आस्था की रक्षा करने का एक बड़ा राष्ट्रीय मिशन बन गया है।
यह सफल परियोजना भविष्य में देश के अन्य प्राचीन मंदिरों और ऐतिहासिक स्मारकों के वैज्ञानिक जीर्णोद्धार के लिए एक बेहतरीन मॉडल साबित हो सकती है। इस कार्य के हर चरण में अंतर्राष्ट्रीय मानकों और वैज्ञानिक अध्ययनों का कड़ाई से पालन किया जा रहा है। वैज्ञानिकों की टीम नींव के भार संतुलन पर विशेष ध्यान दे रही है ताकि आने वाले समय में भारी बर्फबारी या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं का इस प्राचीन मंदिर की मजबूती पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े और तुंगनाथ का संरक्षण पूरी तरह सुनिश्चित हो सके।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। तुंगनाथ मंदिर के वैज्ञानिक संरक्षण कार्य की प्रगति और तकनीकी बदलावों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभागों द्वारा समय समय पर की जाती है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।
Author:अजय त्यागी
July 7, 2026: 7:41 PM
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