जयपुर, राजस्थान। जिला मुख्यालय के नजदीकी ग्रामीण इलाकों में रहने वाले सैकड़ों परिवारों के लिए हर सुबह एक बेहद दर्दनाक हकीकत लेकर आती है। यहाँ के अनेक गांवों में लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने या उनके साथ खेलने के बजाय उन्हें खाट, बिस्तरों या व्हीलचेयर पर संभालने में अपना पूरा दिन बिता रहे हैं। इन बेकसूर ग्रामीणों का जीवन बीते कई वर्षों से फ्लोराइड युक्त पानी का कहर झेलने के कारण पूरी तरह से बर्बाद हो चुका है, जिससे अब युवा पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। [1]
स्थानीय निवासियों का कहना है कि प्रशासन द्वारा साफ पेयजल उपलब्ध कराने के बड़े बड़े वादे जमीनी स्तर पर पूरी तरह से खोखले साबित हुए हैं। जोबनेर, किशनगढ़, रेनवाल और सांभर पंचायत समिति के गांवों में दूषित पानी के कारण अब तक लगभग पंद्रह सौ से अधिक लोग किसी न की शारीरिक विकलांगता का शिकार हो चुके हैं। मंदाभीम सिंह, लोहारवाड़ा, भैसलाना, देसलाना और पचकोडिया जैसे गांवों में फ्लोराइड युक्त पानी का कहर इस कदर बरपा है कि छोटे छोटे बच्चों की रीढ़ की हड्डियां मुड़ चुकी हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि जल जीवन मिशन और बीसलपुर परियोजना के तहत घरों में नल के कनेक्शन तो लगा दिए गए हैं, लेकिन उनमें आज तक पानी की एक बूंद भी नहीं आई है। पाइपलाइनें पूरी तरह से सूखी पड़ी हैं, जिसके कारण लोग फ्लोराइड युक्त भूजल पीने के लिए मजबूर हैं। देवतवालों की ढाणी में एक ही परिवार के आठ मासूम बच्चे इस दूषित पानी के कारण अपंगता का जीवन जी रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में भारी हाहाकार मचा हुआ है।
पीड़ित माताओं ने रोते हुए बताया कि उन्होंने अपने बच्चों के इलाज के लिए कई बड़े डॉक्टरों के चक्कर काटे और अनेक धार्मिक स्थलों पर मन्नतें भी मांगीं, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। गंभीर रूप से बीमार कई बच्चों को तो महंगे ऑपरेशन की सलाह दी गई है, जिसका खर्च उठाना गरीब मजदूरों के बस से बाहर है। हालात इतने बदतर हैं कि बर्तनों में पानी जमा करने पर फ्लोराइड की सफेद परत साफ दिखाई देती है, जो फ्लोराइड युक्त पानी का कहर साफ बयां करती है।
इस विकट समस्या पर डॉक्टरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी गहरी चिंता व्यक्त की है। जोबनेर अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार, पानी में फ्लोराइड की मात्रा निर्धारित मानक से कहीं अधिक होने के कारण दांत पीले पड़ रहे हैं और हड्डियां खोखली हो रही हैं। भूजल स्तर लगातार नीचे गिरने और रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग के कारण यह संकट और गहरा गया है। सामाजिक संस्थाएं पीड़ितों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने और पुनर्वास के कार्यों में लगातार जुटी हुई हैं।
गाँव की महिलाओं का कहना है कि चालीस और पचास वर्ष की उम्र के लोग जोड़ों के असहनीय दर्द के कारण अब बूढ़े दिखने लगे हैं। ग्रामीण अब सरकार से केवल बीसलपुर के मीठे पानी की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने की गुहार लगा रहे हैं, ताकि आने वाली भावी पीढ़ियों को इस अपंगता से पूरी तरह सुरक्षित बचाया जा सके। जब तक स्वच्छ पेयजल नहीं मिलेगा, तब तक इस क्षेत्र के मासूम नागरिकों को फ्लोराइड युक्त पानी का कहर इसी तरह झेलना पड़ेगा।
प्रशासन को इस गंभीर मानवीय संकट को रोकने के लिए तुरंत धरातल पर काम करना होगा अन्यथा यह समस्या विकराल रूप ले लेगी। सामाजिक संस्थाओं की मदद से अब इन सुदूर क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन की तकनीकों को बढ़ावा देने की योजना बनाई जा रही है। लोगों को उम्मीद है कि सरकार उनके दर्द को समझेगी और प्रभावित ढाणियों में बहुत जल्द शुद्ध पेयजल पहुंचाकर इस फ्लोराइड युक्त पानी का कहर झेल रहे मजबूर ग्रामीणों को नई जिंदगी प्रदान करेगी।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। जयपुर के ग्रामीण इलाकों में दूषित भूजल की गंभीर समस्या, जल जीवन मिशन की जमीनी स्थिति, फ्लोराइड युक्त पानी का कहर और इससे ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे हानिकारक प्रभावों को समझने के लिए यह सामग्री प्रस्तुत है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।
Author:अजय त्यागी
July 9, 2026: 7:42 PM
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