बीकानेर, राजस्थान। दुःखों से निवृत्ति एवं सुखों की प्राप्ति के उपाय संवाद कार्यक्रम के दूसरे दिन स्वामी जी ने जीवन को परीक्षा कक्षा जैसा बताया। उन्होंने कहा कि इंसान अपने कर्मों के जरिए लगातार उत्तर लिख रहा है और ईश्वर परीक्षक की तरह सब देख रहा है। परीक्षा पूरी होने के बाद ही सही और गलत का फैसला होता है। इसी सोच को समझाते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में परेशानी आने पर पहले समस्या, फिर उसका कारण और आखिर में निवारण समझना चाहिए। इच्छाओं पर लगाम इसी प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।
स्वामी जी के मुताबिक हर व्यक्ति के जीवन में दुःख आना स्वाभाविक है और इसकी बड़ी वजह अधूरी इच्छाएं या जरूरत से ज्यादा इच्छाएं हैं। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा खड़ी हो जाती है, इसलिए मन लगातार असंतोष में फंस सकता है। उन्होंने दूसरों से जुड़ी अपेक्षाओं को भी दुःख का कारण बताया। किसी व्यक्ति के हमारी इच्छा के मुताबिक काम न करने पर गुस्सा और निराशा बढ़ती है। ऐसे में अपेक्षा कम रखना और हां या ना दोनों स्थितियों में सहज रहना जरूरी है। काम पूरा न हो तो मन में कोई बात नहीं रखना भी मददगार हो सकता है।
उन्होंने कहा कि गलती इंसान से जाने या अनजाने में हो सकती है और सहनशीलता जीवन का सुंदर गुण है। यदि किसी काम में व्यक्ति ने अपनी पूरी क्षमता लगा दी लेकिन सामने वाला उसकी कीमत नहीं समझ पाया तो निराश होने की जरूरत नहीं है। काम को केवल किसी व्यक्ति या संस्था के लिए नहीं बल्कि ईश्वर की ओर से मिले दायित्व की तरह करना चाहिए। स्वामी जी ने इच्छाओं पर लगाम लगाने और भरोसा बनाए रखने की बात कही और समझाया कि अच्छे प्रयास का परिणाम तुरंत न दिखे तो भी धैर्य नहीं खोना चाहिए। समय आने पर कर्मों का फल जरूर सामने आता है।
स्वामी जी ने कहा कि दुनिया में लगातार अलग अलग घटनाएं होती रहती हैं और उन्हें देखकर कभी कभी मन में नास्तिक विचार भी आ सकते हैं। उनके अनुसार इंसान को कर्म करने की स्वतंत्रता मिली है लेकिन इसका मतलब मनमानी करना नहीं है। अपनी इच्छा और बुद्धि से सही काम करना स्वतंत्रता है, जबकि प्रकृति और कानून की मर्यादा तोड़कर अपनी मर्जी चलाना स्वच्छंदता है। इसलिए आजादी के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने फैसलों और कर्मों की दिशा समझकर आगे बढ़ना चाहिए, ताकि स्वतंत्रता का गलत इस्तेमाल जीवन में परेशानी का कारण न बने।
कार्यक्रम में स्वामी जी ने यह भी समझाया कि लोग अक्सर अच्छे काम का अच्छा परिणाम तुरंत चाहते हैं, लेकिन गलत कर्मों के परिणाम से बचना चाहते हैं। उनका कहना था कि दोनों तरह के कर्मों का फल समय आने पर मिलता है। इसलिए किसी काम का मूल्य तुरंत न मिले तो हताश होने के बजाय अपनी नीयत और प्रयास पर भरोसा रखना चाहिए। उन्होंने सकारात्मक सोच, सहनशीलता और ईश्वर के प्रति विश्वास को जीवन में बनाए रखने की बात कही। संदेश साफ था कि इच्छाओं पर लगाम, अपेक्षाओं में संतुलन और कर्मों के प्रति जिम्मेदारी से मन को अधिक सहज रखा जा सकता है।
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Author:अजय त्यागी
August 22, 2026: 8:44 PM
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