लखनऊ, उत्तर प्रदेश। जमीन बेचने को मजबूर नहीं किया जा सकता, यह बात इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम आदेश में साफ कर दी है। अदालत ने कहा कि सरकारी अधिकारी निजी जमीन मालिकों से बिक्री विलेख पर जबरन हस्ताक्षर नहीं करा सकते। जमीन की बिक्री तभी हो सकती है जब मालिक अपनी इच्छा से बेचने के लिए तैयार हो और दोनों पक्ष कीमत पर सहमत हों। PTI की एक रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने अधिकारियों को याचिकाकर्ताओं को परेशान नहीं करने का भी निर्देश दिया है। [1]
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमीन बेचने को मजबूर नहीं किया जा सकता और बिक्री के लिए मालिक की स्वैच्छिक सहमति जरूरी है। अगर जमीन मालिक बेचने को तैयार है और सरकार के साथ कीमत पर आपसी सहमति बन जाती है तो बिक्री विलेख के जरिए जमीन खरीदी जा सकती है। लेकिन मालिक अपनी जमीन बेचने से इनकार करता है तो सरकारी अधिकारी दबाव डालकर उसकी सहमति हासिल नहीं कर सकते। अदालत ने स्वैच्छिक बिक्री और अनिवार्य अधिग्रहण को दो अलग कानूनी प्रक्रियाएं माना है।
यह मामला बलरामपुर जिले के देविपाटन तुलसीपुर गांव की जमीन से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि अधिकारी सड़क चौड़ीकरण के लिए उनकी जमीन बेचने का दबाव बना रहे थे और जिस दर पर जमीन खरीदने की बात हो रही थी, वह उन्हें मंजूर नहीं थी। राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि जरूरी जमीन का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा पहले ही बिक्री विलेखों के जरिए खरीदा जा चुका है और अलग अलग जमीन मालिकों के करीब 104 पंजीकरण हो चुके हैं।
जमीन बेचने को मजबूर नहीं किया जा सकता, इसलिए अगर किसी मालिक की सहमति नहीं मिलती है तो सरकार को वैधानिक भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया अपनानी होगी। हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 के तहत जरूरी प्रक्रिया शुरू करनी होगी। इसका मतलब यह है कि आपसी सहमति से जमीन खरीदने का रास्ता तभी इस्तेमाल हो सकता है जब मालिक खुद तैयार हो। इनकार की स्थिति में कानून में तय अधिग्रहण की प्रक्रिया ही लागू होगी।
हाईकोर्ट की यह टिप्पणी निजी जमीन के मालिकों के लिए अहम है क्योंकि सरकारी परियोजना के लिए जमीन की जरूरत होने और मालिक की सहमति होने को एक ही बात नहीं माना जा सकता। जमीन बेचने को मजबूर नहीं किया जा सकता और केवल इस वजह से बिक्री विलेख नहीं कराया जा सकता कि जमीन किसी सरकारी परियोजना के लिए जरूरी है। अगर सहमति से खरीद संभव नहीं है तो सरकार को कानून में निर्धारित अधिग्रहण प्रक्रिया का पालन करना होगा। अदालत ने इसी कानूनी अंतर को स्पष्ट किया है।
हाईकोर्ट ने अधिकारियों को याचिकाकर्ताओं को परेशान नहीं करने और बिक्री विलेख के लिए उनकी सहमति जबरन हासिल नहीं करने का निर्देश दिया है। जमीन बेचने को मजबूर नहीं किया जा सकता, यह आदेश उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी निजी संपत्ति किसी सरकारी परियोजना के दायरे में आ रही हो। अदालत ने यह भी कहा कि अगर कोई याचिकाकर्ता अपनी इच्छा से जमीन बेचता है तो कानून के मुताबिक बिक्री विलेख कराया जा सकता है। यानी फैसला स्वैच्छिक बिक्री पर रोक नहीं लगाता, बल्कि जबरन सहमति लेने पर रोक लगाता है।
इस फैसले से यह साफ हुआ कि सरकार को निजी जमीन चाहिए तो उसके सामने दो अलग रास्ते हैं। पहला रास्ता मालिक की स्वेच्छा से बिक्री और आपसी कीमत पर सहमति का है। दूसरा रास्ता कानूनी भूमि अधिग्रहण का है, जिसे सहमति नहीं मिलने पर अपनाना होगा। जमीन बेचने को मजबूर नहीं किया जा सकता और सरकारी अधिकारी बिक्री विलेख के लिए दबाव नहीं बना सकते। अदालत का आदेश निजी संपत्ति के अधिकार और सरकारी अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रिया के बीच सीमा को स्पष्ट करता है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। यह आदेश संबंधित मामले के तथ्यों और कानूनी परिस्थितियों के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। भूमि अधिग्रहण या संपत्ति विवाद से जुड़े किसी व्यक्तिगत मामले में कानूनी सलाह के लिए योग्य अधिवक्ता से परामर्श लेना उचित होगा। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।
Author:अजय त्यागी
August 23, 2026: 10:11 AM
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