नई दिल्ली, दिल्ली। शहर के जागने से पहले घरों से कचरा उठाने और उसे हाथ से छांटने वाले हजारों कचरा कामगारों की जिंदगी में धीरे धीरे बदलाव आ रहा है। लंबे समय तक अनदेखे रहे इन लोगों को अब पर्यावरण और सर्कुलर इकोनॉमी के अहम भागीदार के तौर पर पहचान मिल रही है। PTI की एक रिपोर्ट के अनुसार, Project Utthaan से जुड़े 42,000 से ज्यादा कामगारों तक सामाजिक सुरक्षा, वित्तीय सेवाओं और सरकारी योजनाओं की पहुंच बनी है। यह बदलाव कमाई के साथ उनके सम्मान और अधिकारों की तस्वीर भी बदल रहा है। [1]
दिल्ली के 48 वर्षीय जोगिंदर केवट के लिए यह बदलाव आर्थिक स्थिरता लेकर आया। उन्होंने बताया कि पहले वह रोज करीब 100 से 150 रुपये कमाते थे और पूरी रकम घर की तत्काल जरूरतों में खर्च हो जाती थी। Project Utthaan की टीम उनके घर पहुंची और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी। इसके बाद कचरा कामगारों के लिए बचत और आर्थिक सुरक्षा की राह खुली। अब जोगिंदर घर का खर्च संभालने के साथ बच्चों की पढ़ाई और दूसरी जरूरी जरूरतों के लिए कुछ पैसा बचा पा रहे हैं।
40 वर्षीय राशिदा की कहानी भी इसी बदलाव को दिखाती है। वह पति के इकट्ठा किए कचरे को छांटती हैं और कपड़े, बोतल तथा गद्दे की सामग्री अलग करती हैं। पहले परिवार को सरकारी सुविधाओं की ज्यादा जानकारी नहीं थी। Project Utthaan के जरिए उन्हें ई श्रम कार्ड, मुफ्त LPG सिलेंडर और दूसरी सहायता के बारे में पता चला। कचरा कामगारों के लिए जानकारी और दस्तावेज तक पहुंच इसलिए अहम है क्योंकि पात्र होने के बावजूद कई लोग योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते। राशिदा के मुताबिक अब परिवार की मुश्किलें कुछ कम हुई हैं।
32 वर्षीय शबाना के लिए जरूरी दस्तावेज हासिल करना बड़ा बदलाव रहा। बढ़ती महंगाई के बीच वह परिवार की आय बढ़ाने के लिए काम करने लगीं और Project Utthaan के जरिए आयुष्मान कार्ड तथा ई श्रम कार्ड हासिल किए। पहले इलाज का खर्च परिवार को अपनी जेब से उठाना पड़ता था। अब सरकारी स्वास्थ्य योजना का लाभ लेना आसान हुआ है। कचरा कामगारों के परिवारों के लिए ऐसी सुविधा खास मायने रखती है क्योंकि अचानक आने वाला अस्पताल का खर्च सीमित आमदनी वाले परिवार की आर्थिक स्थिति पर भारी पड़ सकता है।
शबाना के मुताबिक अब परिवार की स्थिति कुछ स्थिर हुई है और थोड़ी बचत भी शुरू हुई है। गांव में घर बनाने की दिशा में भी परिवार आगे बढ़ रहा है। उनके लिए बदलाव सिर्फ कार्ड और सरकारी सहायता तक सीमित नहीं बल्कि अपने काम को लेकर बढ़े आत्मसम्मान से भी जुड़ा है। UNDP की पहल कचरा कामगारों को केवल सफाई व्यवस्था का हिस्सा मानने के बजाय अधिकारों और अवसरों वाले नागरिक के रूप में देखने पर जोर देती है। इससे सामाजिक सुरक्षा के साथ भविष्य को लेकर भरोसा भी मजबूत हो रहा है।
Project Utthaan का एक और पहलू कचरे को दोबारा उपयोगी सामान में बदलना है। दिल्ली के एक अपसाइक्लिंग केंद्र में फेंकी गई दूध की पन्नियों को पहले धोकर सुखाया जाता है। फिर उन्हें लंबी प्लास्टिक पट्टी में काटकर सूती धागे के साथ लकड़ी के फ्रेम पर बुना जाता है। इससे बैग, बटुए और पौधे रखने वाले होल्डर जैसे सामान तैयार होते हैं। यानी कचरा कामगार जिस सामग्री को रोज अलग करते हैं वही सही प्रक्रिया के बाद नई उपयोगी वस्तु और कमाई का जरिया बन सकती है।
UNDP की भारत में प्रतिनिधि एंजेला लुसिगी के मुताबिक कचरा छांटने और रिसाइकिल करने वाले कामगार रोज जलवायु कार्रवाई में योगदान देते हैं लेकिन लंबे समय तक उन्हें जलवायु नेताओं के रूप में पहचान नहीं मिली। 2026 में World Environment Day पर शुरू Planet Starts With People अभियान ने इन्हें जलवायु कहानी के केंद्र में रखने पर जोर दिया। UNDP India के अशिष चतुर्वेदी के मुताबिक जानकारी और भरोसे की कमी बड़ी बाधा थी। अब एक व्यक्ति को लाभ मिलने के बाद दूसरे लोग भी आगे बढ़ रहे हैं। कचरा कामगारों की नई पहचान इसी बदलाव का सबसे अहम हिस्सा है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का लाभ संबंधित पात्रता, दस्तावेज और विभागीय नियमों के अनुसार ही मिलता है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।
Author:अजय त्यागी
September 2, 2026: 6:21 PM
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