नई दिल्ली, दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने NALSAR विवाद में BCI का आदेश रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों के आचरण पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया को अनुशासनात्मक कार्रवाई का वैधानिक अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि जब तक कोई कानून का छात्र वकील के तौर पर नामांकित नहीं होता तब तक उसके खिलाफ ऐसी कार्रवाई BCI या State Bar Council नहीं कर सकती। छात्रों के अनुशासन का अधिकार संबंधित शैक्षणिक संस्था के पास रहेगा। फैसले से बार काउंसिल और कानून छात्रों के बीच अधिकार क्षेत्र की स्थिति साफ हुई है। [1]
सुप्रीम कोर्ट ने Advocates Act 1961 की व्याख्या करते हुए कहा कि कानून में BCI या State Bar Councils को छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की कोई स्पष्ट या निहित शक्ति नहीं दी गई है। अदालत ने कहा कि BCI कानूनी शिक्षा के मानक तय कर सकती है लेकिन इससे उसे छात्रों के व्यक्तिगत आचरण पर कार्रवाई का अधिकार नहीं मिल जाता। छात्र के खिलाफ अनुशासनात्मक कदम उसके मूल संस्थान या वहां लागू नियमों के तहत सक्षम प्राधिकारी ही उठा सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बार काउंसिल का अनुशासनात्मक अधिकार वकील के रूप में नामांकन के बाद लागू होता है।
मामला NALSAR के 2026 बैच से जुड़ा था। छात्रों की ओर से मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की प्रस्तावित दीक्षांत समारोह में भागीदारी को लेकर आपत्ति जताई गई थी। इसके बाद BCI अध्यक्ष की ओर से 13 अगस्त को निर्देश जारी किए गए थे जिनमें 2026 बैच के छात्रों के अधिवक्ता के रूप में नामांकन पर रोक लगाने और छात्रों तथा शिक्षकों की भूमिका की जांच की बात कही गई थी। बाद में BCI ने अपने निर्देश वापस ले लिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अब संबंधित संचारों को कानून के अधिकार के बिना जारी माना और BCI का आदेश रद्द कर दिया।
विवाद के दौरान BCI ने NALSAR के छात्रों के खिलाफ कदम उठाया था और राज्य बार काउंसिलों को उनके नामांकन पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। बाद में BCI ने कार्यवाही बंद कर दी और कहा कि 2026 बैच के छात्रों की किसी गड़बड़ी या आंदोलन में भूमिका नहीं मिली। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या बार काउंसिल के पास वकील बनने से पहले किसी कानून छात्र के आचरण की जांच या उस पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है। अदालत ने इस सवाल का जवाब साफ तौर पर नकारात्मक दिया और BCI की वैधानिक भूमिका को छात्रों से अलग बताया।
फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि कानून छात्रों के अनुशासन से जुड़े मामलों में संबंधित विश्वविद्यालय या उसकी नियमावली के तहत गठित प्राधिकारी की भूमिका रहेगी। BCI का काम कानूनी शिक्षा के मानक तय करने और नामांकित वकीलों के पेशेवर आचरण को नियंत्रित करने से जुड़ा है। अदालत ने BCI का आदेश रद्द करते हुए पहले दिए गए अंतरिम संरक्षण को भी स्थायी कर दिया। इसका सीधा मतलब है कि केवल कानून की पढ़ाई कर रहे छात्र को बार काउंसिल उसी तरह अनुशासनात्मक दायरे में नहीं ला सकती जिस तरह नामांकित अधिवक्ता को ला सकती है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार स्रोतों और उपलब्ध न्यायिक तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। न्यायालय के आदेश और लागू कानूनी प्रावधानों की आधिकारिक व्याख्या को ही अंतिम माना जाना चाहिए और इस रिपोर्ट को किसी व्यक्ति या संस्था के लिए कानूनी सलाह नहीं माना जाना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।
Author:अजय त्यागी
September 3, 2026: 4:24 PM
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