सरकारी स्कूलों में पत्रकारों, यूट्यूबरों और बाहरी लोगों की एंट्री, फोटो, वीडियो, इंटरव्यू और लाइव स्ट्रीमिंग पर लगी अनुमति व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार किया है। अदालत ने इस स्तर पर अनुच्छेद 32 के तहत याचिका नहीं सुनी। फैसला बच्चों की सुरक्षा और अनुशासन के लिहाज से समझ में आता है, लेकिन असली सवाल वहीं खड़ा है जहां कैमरा बंद होते ही व्यवस्था की पोल भी बंद हो जाए। स्कूलों की बदहाली को पर्दे में रखना इसका समाधान नहीं।
बच्चों की सुरक्षा बहाना नहीं बल्कि पहली जिम्मेदारी है और बिना अनुमति किसी स्कूल में घुसकर शिक्षक को कैमरे पर कटघरे में खड़ा करना भी सही नहीं। लेकिन नियम ऐसा भी न हो कि अनुमति की चाबी उन्हीं हाथों में रहे जिन्हें व्यवस्था की कमियां दिखाने में असुविधा हो। आखिर सरकारी स्कूल जनता के पैसे से चलते हैं। यहां पढ़ने वाले बच्चे किसी बंद दरवाजे के पीछे छिपे आंकड़े नहीं हैं। स्कूलों की बदहाली सामने आए तो सुधार की शुरुआत हो सकती है, पर्दा डालने से नहीं।
राजस्थान में सामने आए आंकड़े इस बहस को और गंभीर बनाते हैं। विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार 611 सरकारी स्कूल अपने भवन के बिना चल रहे हैं। अपने भवन वाले 64,484 स्कूलों में 2,047 में शौचालय और 1,049 में पीने के पानी की सुविधा नहीं है। हालिया सर्वे में 5,667 स्कूल भवन जर्जर मिले और 1,579 पहले से जर्जर घोषित भवनों की मरम्मत शुरू नहीं हुई थी। यह आंकड़े स्पष्ट बता रहे हैं कि स्कूलों की बदहाली कैमरे की देन नहीं, वर्षों की निगरानी की कमी का नतीजा है।
दर्दनाक उदाहरण झालावाड़ का है। जुलाई 2025 में जर्जर स्कूल भवन गिरने से 7 बच्चों की मौत और 27 बच्चे घायल हुए थे। शिक्षा विभाग ने हादसे से 10 दिन पहले ही मानसून से पहले भवनों की जांच और मरम्मत के निर्देश दिए थे। फिर भी कार्रवाई नहीं हुई। सवाल यह नहीं कि कैमरा क्यों पहुंचा, सवाल यह है कि चेतावनी स्कूल की दीवार तक पहुंचकर जिम्मेदार अफसरों की मेज पर क्यों रुक गई। अगर निगरानी समय पर होती तो शायद हादसे की खबर ही नहीं लिखनी पड़ती।
अब जरा उस व्यवस्था की कल्पना कीजिए जहां स्कूल की छत टपकती रहे, शौचालय खराब हो, पानी न मिले या शिक्षक कम हों, मगर बाहर से देखने वाले को अनुमति की फाइल ढूंढनी पड़े। यह व्यवस्था पारदर्शिता की जगह औपचारिकता पैदा कर सकती है। मीडिया की स्वतंत्रता पर असर डालने वाले किसी भी निर्णय के साथ स्पष्ट नियम, समय सीमा और अपील की व्यवस्था जरूरी है। पत्रकार को अनुमति देना सरकार की कृपा नहीं बल्कि सार्वजनिक हित की रिपोर्टिंग के लिए पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रिया होनी चाहिए।
स्कूलों की बदहाली पर रिपोर्टिंग करने वाला हर व्यक्ति निष्पक्ष हो यह जरूरी है, क्योंकि कैमरा लेकर पहुंचना भी जिम्मेदारी मांगता है। बच्चों के चेहरे बिना अनुमति दिखाना, शिक्षकों को अपमानित करना या वीडियो को सनसनी बनाना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। लेकिन गलत पत्रकारिता रोकने का रास्ता पूरी पत्रकारिता रोकना नहीं हो सकता। शिकायत हो तो जांच हो, नियम टूटे तो कार्रवाई हो और सही रिपोर्टिंग हो तो उसे जगह मिले। लोकतंत्र में सवालों को अनुशासन के नाम पर हमेशा चुप कर देना स्वस्थ संकेत नहीं है।
इस विवाद का बेहतर रास्ता तकनीक और जवाबदेही से निकल सकता है। हर सरकारी स्कूल में समुचित सीसीटीवी व्यवस्था हो, कैमरों की नियमित जांच हो और रिकॉर्डिंग सुरक्षित तरीके से रखी जाए। शिक्षा विभाग में एक केंद्रीय कमांड कंट्रोल सेंटर बनाया जा सकता है जहां अधिक जोखिम वाले स्कूलों की निगरानी हो, आपात स्थिति में तुरंत सूचना मिले और जिलों से रिपोर्ट सीधे देखी जा सके। इससे बाहरी कैमरों पर निर्भरता घटेगी और स्कूलों की बदहाली को छिपाने के बजाय विभाग खुद समय रहते समस्या पकड़ सकेगा।
इसके साथ जिला शिक्षा अधिकारी, प्रधानाध्यापक, स्कूल प्रबंधन समिति और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। जर्जर भवन, खुले तार, असुरक्षित बोरवेल, जलभराव, खराब भोजन, पानी या शौचालय जैसी शिकायतों के लिए डिजिटल शिकायत और समयबद्ध निस्तारण व्यवस्था बनाई जा सकती है। केंद्र सरकार की स्कूल सुरक्षा गाइडलाइंस भी सुरक्षित वातावरण, जोखिम की पहचान और जवाबदेही पर जोर देती हैं। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कैमरा किसका है, बल्कि यह होना चाहिए कि स्कूल सुरक्षित क्यों नहीं है और सुधार की जिम्मेदारी किसकी है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्यों के पास व्यवस्था सुधारने का अवसर है। अनुमति प्रणाली सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बने, पत्रकारों और जिम्मेदार नागरिकों के लिए स्पष्ट रास्ता हो और गंभीर शिकायत पर प्रशासन खुद निरीक्षण कर रिपोर्ट सार्वजनिक करे। खतरा यही रहेगा कि स्कूलों की बदहाली दरवाजे के बाहर खड़ी रहे और भीतर कागजी निरीक्षण चलता रहे। कैमरा बंद करने से सवाल खत्म नहीं होते। बच्चों की सुरक्षा के साथ पारदर्शिता भी जरूरी है, क्योंकि स्कूलों की बदहाली छिपाने से नहीं, पहचानकर सुधारने से दूर होगी।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। स्कूलों में मीडिया प्रवेश, निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही से संबंधित सुझाव सार्वजनिक हित में प्रस्तुत किए गए विचार हैं और इन्हें किसी न्यायिक आदेश या सरकारी नीति का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।
Author:अजय त्यागी
September 4, 2026: 12:44 PM
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