कोटा, राजस्थान (राहुल पारीक)। रिद्धि सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में विराग वर्धन वर्षायोग 2026 के तहत धर्मसभा हुई। गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ससंघ के चातुर्मासिक प्रवास के दौरान हुई सभा में उन्होंने कर्मों का क्षय और मोक्ष के संबंध को समझाया। मुनिश्री ने कहा कि जीव जब आठों कर्मों का पूर्ण क्षय कर देता है तब वह कर्मबंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है और अनंत सुख की अवस्था में पहुंचता है।
धर्मसभा में मुनिश्री ने बताया कि कर्मों का क्षय होने के बाद जीव का स्वभाव ऊर्ध्वगमन होता है। मुक्त जीव लोक के ऊर्ध्व भाग में स्थित सिद्धशिला तक पहुंचकर वहीं स्थिर हो जाता है। उन्होंने कहा कि सिद्धशिला वह पवित्र स्थान है जहां संसार के सभी मुक्त जीव जाकर विराजमान होते हैं और इसके आगे जीव का गमन संभव नहीं होता। इस बात को समझाते हुए उन्होंने श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण की दिशा में धर्मसाधना और सही दृष्टि अपनाने का संदेश दिया।
मुनि विवर्धनसागर ने ढाई द्वीप की सीमा को मनुष्य जीवन के लिए विशेष महत्व वाला बताया। उनके अनुसार मनुष्य पर्याय में जीव इसी क्षेत्र में धर्मसाधना करते हुए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के माध्यम से मोक्षमार्ग की ओर बढ़ सकता है। जैन दर्शन में सम्यग्दर्शन को आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया है। धर्मसभा में मुनिश्री के इस संदेश ने श्रद्धालुओं को जीवन में धर्म, संयम और आत्मचिंतन को महत्व देने की प्रेरणा दी। इस संदेश में कर्मबंधन से मुक्ति के लिए साधना की भूमिका पर जोर रहा।
आयोजन के दौरान मंदिर समिति अध्यक्ष राजेंद्र गोधा और मंत्री पंकज खटोड़ ने कार्यक्रम की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि धर्मसभा में चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन और मुनि संघ के पाद प्रक्षालन की धार्मिक क्रियाएं भी हुईं। इन क्रियाओं का सौभाग्य प्रमोद कुमार, श्रीमती करुणा और ईशान कुमार रावका परिवार को प्राप्त हुआ। धर्मसभा में सकल समाज के महामंत्री पदम बडला, जैनेंद्र जज, टीकम पाटनी, पारस बज, पदम हरसौरा और पारस लुहाड़िया समेत अनेक श्रद्धालु मौजूद रहे। आयोजन में मौजूद लोगों ने धार्मिक विधियों में श्रद्धापूर्वक सहभागिता की।
मंदिर समिति के सदस्यों के साथ कैलाश जैन, महावीर जैन और पारस गोधा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने धर्मसभा में सहभागिता की। आयोजन में धार्मिक विधियों के साथ मुनिश्री के प्रवचन ने आत्मकल्याण और मोक्ष की दिशा को केंद्र में रखा। कर्मों का क्षय जीव के बंधन से मुक्त होने की प्रक्रिया का आधार बताया गया। धर्मसभा में दिया गया संदेश श्रद्धालुओं के लिए आत्मचिंतन, सम्यग्दर्शन और धर्मसाधना की ओर बढ़ने की प्रेरणा बना और पूरे आयोजन में श्रद्धा का वातावरण दिखाई दिया।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। धार्मिक सिद्धांतों से संबंधित विवरण जैन दर्शन की मान्यताओं और कार्यक्रम में दिए गए वक्तव्य के संदर्भ में प्रस्तुत किए गए हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।
Author:अजय त्यागी
September 5, 2026: 7:49 PM
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