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Rex TV India
Latest News संपादकीय Digital Newsletter 09 Sep 2026 · 10:19 AM

खाद्य मिलावट: मानव स्वास्थ्य को निगल रहा मिलावट का जहर! जिम्मेदार कौन? 

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India (AI)

हमारी थाली में पहुंचने वाला खाना सिर्फ भूख मिटाने का जरिया नहीं, बल्कि परिवार की सेहत और भरोसे की बुनियाद है। लेकिन राजस्थान में 2024 के दौरान जांचे गए 14,061 खाद्य नमूनों में 3,595 नमूने असंतोषजनक पाए गए और 591 नमूनों को मानव उपभोग के लिए खतरनाक बताया गया। जयपुर में भी 28.5 प्रतिशत नमूने गुणवत्ता जांच में विफल रहे। ये आंकड़े बताते हैं कि खाद्य मिलावट अब सिर्फ बाजार की गड़बड़ी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का गंभीर सवाल बन चुकी है। लेकिन बड़ा सवाल है कि आखिर जिम्मेदार कौन?

दूध का भरोसा

दूध को घर में पोषण और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक इसकी जरूरत सबसे ज्यादा रहती है। यही कारण है कि दूध में मिलावट की आशंका सिर्फ एक उत्पाद की गुणवत्ता का सवाल नहीं रहती, बल्कि सीधे परिवार के स्वास्थ्य से जुड़ जाती है। आम आदमी हर पैकेट या खुले दूध की प्रयोगशाला जांच नहीं कर सकता। ऐसे में उसका भरोसा व्यवस्था, कारोबारी ईमानदारी और निगरानी तंत्र पर टिका रहता है। सवाल यही है कि यह भरोसा टूटने पर आखिर जिम्मेदार कौन?

खाद्य मिलावट का सबसे बड़ा खतरा यही है कि उपभोक्ता कई बार उसे अपनी आंखों से पहचान नहीं सकता। सफेद दूध देखकर शुद्धता तय नहीं होती और पैकेट पर छपी जानकारी भी हर जोखिम की गारंटी नहीं देती। राजस्थान में 2025 की समीक्षा बैठक के दौरान FSSAI ने दूध, घी, पनीर और मसालों के नियमित नमूने लेने और लंबित मामलों को तेजी से निपटाने पर जोर दिया था। इसका सीधा मतलब है कि निगरानी लगातार होनी चाहिए, केवल त्योहार या बड़ी कार्रवाई के समय नहीं लेकिन धरातल पर वही मौसमी बीमारी जैसा हाल, तो आखिर जिम्मेदार कौन? 

मसालों का खेल

भारतीय रसोई में मसालों की भूमिका स्वाद से कहीं बड़ी है। हल्दी, मिर्च और दूसरे मसाले रोज के भोजन का हिस्सा हैं, इसलिए इनकी गुणवत्ता पर सवाल पूरे खाद्य तंत्र पर असर डालता है। ज्यादा चमकदार रंग, आकर्षक पैकेट और बड़े दावे उपभोक्ता को प्रभावित जरूर करते हैं, लेकिन असली कसौटी उत्पाद की गुणवत्ता है। राजस्थान की जांचों में मसालों समेत कई खाद्य वस्तुओं के नमूनों को लेकर सवाल उठे हैं। यही वजह है कि खरीदते समय केवल कीमत और दिखावट नहीं, भरोसेमंद जानकारी भी जरूरी है। लेकिन अधूरी या अस्पष्ट जानकारी के लिए आखिर जिम्मेदार कौन?

खाद्य मिलावट की समस्या सिर्फ दुकान तक सीमित नहीं समझी जा सकती। उत्पादन, प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन और बिक्री की पूरी श्रृंखला में निगरानी जरूरी है। अगर किसी एक चरण पर नियंत्रण कमजोर हुआ तो खराब या संदिग्ध उत्पाद आगे बढ़ सकता है। केंद्र सरकार के अनुसार पिछले 3 वर्षों में 5.18 लाख से अधिक खाद्य नमूनों का विश्लेषण हुआ, 88,192 दंड लगाए गए और 3,614 मामलों में दोषसिद्धि हुई। देश में 252 खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाएं और 305 Food Safety on Wheels इकाइयां भी बताई गई हैं। लेकिन फिर भी धरातल पर असर ना के बराबर, तो आखिर जिम्मेदार कौन?

चमक का सच

फल और सब्जियां खरीदते समय चमक और ताजगी देखकर फैसला करना आम बात है। लेकिन प्राकृतिक खाद्य पदार्थ हर बार एक जैसे सुंदर नहीं दिखते। उपभोक्ता को यह समझना जरूरी है कि चमकदार रंग अपने आप में गुणवत्ता का प्रमाण नहीं है। दूसरी तरफ हर चमकदार फल या सब्जी को संदिग्ध मान लेना भी सही नहीं होगा। असली चुनौती यह है कि बाजार में सुरक्षित और असुरक्षित उत्पाद के बीच भरोसेमंद अंतर कैसे बताया जाए। इसके लिए वैज्ञानिक जांच, स्पष्ट जानकारी और नियमित निगरानी तीनों जरूरी हैं। लेकिन धरातल पर इनकी बेहद कमी, तो आखिर जिम्मेदार कौन?

आज उपभोक्ता से कहा जाता है कि वह लेबल पढ़े, पैकेट देखे, सामग्री जांचे और जरूरत पड़ने पर शिकायत करे। जागरूकता निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन सारी जिम्मेदारी ग्राहक पर डाल देना आसान रास्ता है। एक सामान्य परिवार हर खाद्य वस्तु को प्रयोगशाला नहीं भेज सकता। यही वजह है कि खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य ऐसा बाजार बनाना होना चाहिए जहां ईमानदार कारोबारी को प्रतिस्पर्धा में नुकसान न हो और गलत तरीके अपनाने वाले को समय रहते रोका जा सके। लेकिन यह सब करने के लिए आखिर जिम्मेदार कौन?

मुनाफे की जड़

मिलावट का आर्थिक कारण अक्सर ज्यादा मुनाफे की चाह से जुड़ता है। सस्ता पदार्थ महंगे उत्पाद में मिलाना, घटिया सामग्री को बेहतर बताना या गुणवत्ता से समझौता करना तभी बढ़ता है जब उसे रोकने का डर कमजोर हो। राजस्थान में 2024 के दौरान मिलावटी खाद्य उत्पादों पर कार्रवाई और कानूनी मामलों की संख्या ने भी समस्या की गंभीरता सामने रखी। लेकिन केवल जब्ती और छापे पर्याप्त नहीं हैं। जरूरी यह है कि कारोबार की पूरी श्रृंखला में जवाबदेही तय हो और कार्रवाई समय पर पूरी हो। लेकिन इस लेटलतीफी के लिए आखिर जिम्मेदार कौन?

खाद्य मिलावट के खिलाफ सबसे असरदार रणनीतिक रोकथाम होनी चाहिए। नमूने नियमित लिए जाएं, प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़े, रिपोर्ट समय पर आए और शिकायतों पर कार्रवाई दिखाई भी दे। FSSAI ने राजस्थान की 2025 की समीक्षा में लगातार निगरानी, नियमित सैंपलिंग और मामलों के शीघ्र निपटारे पर जोर दिया था। बैठक में यह भी सामने आया कि खाद्य सुरक्षा से जुड़े मामलों की प्रक्रिया में देरी समस्या को कमजोर कर सकती है। कानून मौजूद होना जरूरी है, लेकिन उसका समय पर और लगातार इस्तेमाल उससे भी ज्यादा जरूरी है। इन सबके बावजूद लापरवाही, तो आखिर जिम्मेदार कौन?

रोकथाम जरूरी

आम आदमी को सुरक्षित भोजन चाहिए, संदेह से भरी थाली नहीं। वह दूध खरीदते समय रसायन विशेषज्ञ नहीं बन सकता और मसाला खरीदते समय खाद्य वैज्ञानिक नहीं बन सकता। उसकी जिम्मेदारी सावधानी बरतने तक होनी चाहिए, जबकि गुणवत्ता सुनिश्चित करना व्यवस्था और कारोबार दोनों की जिम्मेदारी है। उपभोक्ता लेबल देखे, भरोसेमंद विक्रेता चुने और संदिग्ध उत्पाद की शिकायत करे, लेकिन सरकारी एजेंसियों को नियमित जांच और पारदर्शी कार्रवाई भी सुनिश्चित करनी होगी। तभी बाजार में भरोसा लौटेगा और मिलावट के लिए जगह कम होगी। लेकिन बड़ा सवाल कि करेगा कौन?

खाद्य मिलावट को केवल कानून व्यवस्था का विषय मानना भी पर्याप्त नहीं है। इसका संबंध पोषण, बीमारी, परिवार की आर्थिक स्थिति और समाज के भरोसे से है। सुरक्षित भोजन मिलने का मतलब सिर्फ पेट भरना नहीं, बल्कि ऐसा भोजन पाना है जो स्वास्थ्य के लिए अनावश्यक जोखिम न बढ़ाए। इसलिए जरूरत छिटपुट अभियानों से आगे बढ़कर लगातार निगरानी की है। कारोबारियों को गुणवत्ता के मानकों का पालन करना होगा और अधिकारियों को जांच से लेकर कार्रवाई तक पूरी प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और जवाबदेह बनाना होगा। लेकिन बड़ा सवाल कि करेगा कौन?

थाली में लौटे भरोसा 

खाद्य मिलावट के खिलाफ लड़ाई आखिरकार थाली में भरोसा लौटाने की लड़ाई है। जिस दिन आम आदमी बिना डर और शक के दूध, तेल, मसाले, मिठाई और रोजमर्रा का खाना खरीद सकेगा, उसी दिन खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की असली सफलता मानी जाएगी। इसके लिए उपभोक्ता की जागरूकता जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी मजबूत निगरानी, वैज्ञानिक परीक्षण और समय पर कार्रवाई है। बाजार की चमक से ज्यादा अहम थाली की सुरक्षा है। क्योंकि भोजन सिर्फ व्यापार की वस्तु नहीं, बल्कि हर परिवार की सेहत, उम्मीद और भविष्य का हिस्सा है। लेकिन बड़ा सवाल कि करेगा कौन?

बहरहाल, सभी सवालों का केवल एक जवाब है कि सरकार, प्रशासन और आम नागरिक सभी जिम्मेदार बनें। अपने हक, अधिकार, जिम्मेदारियों को ना सिर्फ पहचाने बल्कि उनके अनुसार आचरण भी करें। उपभोक्ता कोई भी सामान खरीदते समय सावधानी बरतें, गलत सामान की शिकायत करें, उस शिकायत पर की गई कार्रवाई का जवाब भी मांगे और यदि सुनवाई ना हो तो उच्च स्तर तक शिकायत करें, फिर भी समाधान ना मिले तो न्यायालय की शरण में जाएं। केवल यह सोचकर छोड़ देने से काम नहीं बनेगा कि मुझे क्या मतलब! यदि जागरूक नहीं हुए, शिकायत नहीं की,  सवाल नहीं पूछे और जवाब भी नहीं मांग सको तो एक सवाल खुद से करना कि आखिर जिम्मेदार कौन?   

अस्वीकरण (Disclaimer):

प्रस्तुत आलेख एक सम्पादकीय आलेख है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। इसमें दिए गए विचार और सुझाव लेखक के अपने स्वतंत्र विचार हैं, किसी अन्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। इस के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

Rex TV India Author:अजय त्यागी September 9, 2026: 10:19 AM © 2026 Rex TV India Contact @ 91 6376887816 | rextvindia@gmail.com
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