काठमांडू, नेपाल। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण और कूटनीति जगत से इस वक्त एक बेहद गंभीर खबर सामने आ रही है, जो जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से जूझते देशों की स्थिति को उजागर करती है। नेपाल में आए विनाशकारी फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) और भूस्खलन की भयंकर घटना को एक महीना बीत चुका है, लेकिन हिमालयी राष्ट्र अब भी भारी नुकसान की भरपाई और जलवायु न्याय के लिए वैश्विक स्तर पर कड़ा संघर्ष कर रहा है। इस आपदा के कारण देश को आधारभूत संरचना और आजीविका के मोर्चे पर भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी है, जिसकी भरपाई के लिए सरकार लगातार अंतरराष्ट्रीय सहायता और त्वरित मुआवजे की मांग कर रही है। [1]
विस्तृत जानकारियों के मुताबिक, पिछले दिनों नेपाल में हुई इस भयंकर तबाही के कारण अनुमानित रूप से अरबों रुपये का नुकसान हुआ है, जो देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का एक बड़ा हिस्सा है। वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों का यह स्पष्ट रूप से मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग, कोयले और तेल के अत्यधिक उपयोग तथा तापमान वृद्धि के कारण पिघलते ग्लेशियरों की वजह से इस तरह की भीषण प्राकृतिक आपदाएं लगातार बढ़ रही हैं। इस आपदा में हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए, जिससे देश का सामान्य जनजीवन पूरी तरह से पटरी से उतर गया है और पुनर्निर्माण कार्य एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है।
इस गंभीर संकट से निपटने के लिए नेपाल सरकार ने संयुक्त राष्ट्र समर्थित 'लॉस एंड डैमेज फंड' (Loss and Damage Fund) के माध्यम से औपचारिक रूप से बीस मिलियन डॉलर की जलवायु वित्तपोषण आर्थिक सहायता की मांग की है। हालांकि, अधिकारियों का यह कहना है कि वैश्विक स्तर पर ऐसे कई आपदा प्रभावित देश सहायता के लिए कतार में हैं, जिसके कारण इस प्रक्रिया में काफी कागजी औपचारिकताएं और समय लग रहा है। नेपाली नेतृत्व ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई है कि गरीब और विकासशील देशों को आपदा के वक्त भी सहायता पाने के लिए लंबी और जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जबकि जलवायु संकट के लिए मुख्य रूप से बड़े औद्योगिक देश जिम्मेदार हैं।
नेपाल के शीर्ष राजनेताओं और पर्यावरणविदों ने वैश्विक मंचों पर यह पुरजोर पक्ष रखा है कि जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली तबाही के लिए अमीर देशों की स्पष्ट ऐतिहासिक और नैतिक जिम्मेदारी बनती है। उनका यह तर्क है कि आपदा के बाद मिलने वाली सहायता (जलवायु वित्तपोषण) को किसी प्रकार की 'दया या दान' नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि इसे वैश्विक उत्सर्जन करने वाले प्रमुख राष्ट्रों की कानूनी और नैतिक जवाबदेही माना जाना चाहिए। चूँकि नेपाल जैसे देश वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में नगण्य योगदान देते हैं, फिर भी उन्हें जलवायु असंतुलन की सबसे भारी कीमत चुकानी पड़ रही है, जो अंतरराष्ट्रीय जलवायु न्याय के सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ है।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते हिमालयी क्षेत्रों के संरक्षण और जलवायु वित्तपोषण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में दक्षिण एशिया के करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। नेपाल की इस मुखर मांग ने दुनिया भर के विकसित देशों के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वे समय रहते संवेदनशीलता दिखाते हुए कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देशों को इस आपदा से उबारने के लिए आगे आएंगे। फिलहाल देश और दुनिया की तमाम निगाहें आगामी अंतरराष्ट्रीय जलवायु बैठकों पर टिकी हैं, जहां इन गंभीर मुद्दों पर आगे की ठोस रणनीतियों पर चर्चा होनी है।
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Author:अजय त्यागी
September 27, 2026: 12:51 PM
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