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Rex TV India
Latest News श्रृद्धांजलि Digital Newsletter 28 Sep 2026 · 11:57 AM

वैचारिक क्रांति और सर्वोच्च बलिदान की जीवंत गाथा -शहीद भगत सिंह 

शहीद भगत सिंह की दुर्लभ फ़ोटो

अमर शहीद भगत सिंह की 119वीं जयंती पर भावभीनी श्रद्धांजलि   

इंकलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद कर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पूरी दिशा और दशा बदलने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह का जीवन केवल किसी एक क्रांतिकारी का साधारण इतिहास नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रभक्ति, गहरी वैचारिक क्रांति और सर्वोच्च बलिदान की एक अत्यंत जीवंत गाथा है। मात्र तेईस वर्ष की अल्पायु में हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने वाले भगत सिंह आज भी देश-विदेश के करोड़ों युवाओं के दिलों में सीधे तौर पर प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। उनका जन्म 28 सितंबर 1907 (कई प्रलेखों में 27 सितंबर का उल्लेख भी मिलता है) को पंजाब के लायलपुर (फिलहाल फैसलाबाद, पाकिस्तान) जिले के बंगा गांव में एक प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी परिवार के भीतर हुआ था।

बचपन की घटनाएं और प्रभाव

देशभक्ति उनके खून और संस्कारों में रची-बसी थी, क्योंकि उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह दोनों ही स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल में बंद रह चुके थे। जब भगत सिंह महज बारह वर्ष की छोटी आयु के थे, तब वर्ष उन्नीस सौ उन्नीस में अत्यंत क्रूर जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसी हृदयविदारक घटना घटी थी। इस भीषण नरसंहार ने उनके कोमल बाल-मन को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था, जिसके बाद वे स्कूल से बंक मारकर जालंधर से अमृतसर पैदल पहुंचे थे। वहां से उस रक्त-रंजित मिट्टी को कांच की बोतल में भरकर घर लाए, जिसने उन्हें आजीवन देश के लिए जीने का संकल्प दिया।

किताबी प्रेम और विचार

भगत सिंह केवल एक बंदूक उठाने वाले उग्र क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे एक प्रखर विचारक, दार्शनिक और उच्च कोटि के बुद्धिजीवी भी थे। उन्हें पढ़ने का गहरा और असाधारण शौक था, जिसके कारण लाहौर के नेशनल कॉलेज में अध्ययन के दौरान उन्होंने दुनिया भर के क्रांतिकारी आंदोलनों, समाजवाद तथा साम्यवाद का सूक्ष्म अध्ययन किया था। जेल की तंग कालकोठरी के भीतर भी उन्होंने सैकड़ों प्रसिद्ध किताबें पढ़ीं और फांसी के फंदे पर जाने से ठीक कुछ मिनट पहले तक वे महान क्रांतिकारी लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। जब जेलर ने उन्हें जाने को कहा, तो उन्होंने कहा कि एक क्रांतिकारी दूसरे से मिल रहा है।

पत्रकारिता और रचनाएं

भगत सिंह कई अलग-अलग भाषाओं के बहुत बड़े ज्ञाता थे और वे हिंदी, पंजाबी, उर्दू, अंग्रेजी तथा संस्कृत भाषाओं पर पूरा अधिकार रखते थे। उन्होंने 'कीर्ति', 'प्रताप' और 'महारथी' जैसे प्रतिष्ठित अखबारों में बलवंत सिंह तथा विद्रोही जैसे प्रसिद्ध उपनामों से कई वैचारिक लेख लिखे। इसके अलावा, जेल में रहते हुए उन्होंने अपनी बेहद चर्चित और तार्किक पुस्तक "मैं नास्तिक क्यों हूँ?" लिखी, जो आज भी वैचारिक और दार्शनिक साहित्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। उनके इन लेखों और विचारों ने देश के युवाओं में स्वतंत्रता की अलख जगाने का महान कार्य किया था।

ऐतिहासिक कार्य और गिरफ्तारियां

साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज और उनकी मृत्यु का बदला लेने के लिए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने ब्रिटिश अधिकारी जॉन सांडर्स को मार गिराया था। इसके बाद, ब्रिटिश सरकार के दमनकारी कानूनों का पुरजोर विरोध करने के लिए आठ अप्रैल उन्नीस सौ انनीस को उन्होंने सेंट्रल असेंबली में बम फेंके, जिनका मकसद किसी की जान लेना नहीं बल्कि सोई हुई सरकार को जगाना था। वे चाहते तो आसानी से भाग सकते थे, लेकिन उन्होंने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी ताकि अदालत को वे अपने क्रांतिकारी विचारों के प्रचार का एक बड़ा मंच बना सकें।

जेल संघर्ष और शहादत

जेल के अंदर जाने के बाद भी भगत सिंह की वैचारिक लड़ाई बिल्कुल भी कम नहीं हुई, बल्कि उन्होंने भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के खिलाफ एक सौ सोलह दिनों की लंबी और ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। ब्रिटिश सरकार उनकी लोकप्रियता से इस कदर पूरी तरह से खौफजदा थी कि उसने तय तारीख से ग्यारह घंटे पहले ही तेईस मार्च उन्नीस सौ इकतीस की शाम को ही गुपचुप तरीके से उन्हें फांसी पर लटका दिया। फांसी के तख्ते पर चढ़ते समय भी उनके चेहरों पर कोई शिकन नहीं थी, बल्कि वे सब मुस्कुराते हुए "मेरा रंग दे बसंती चोला" गीत गा रहे थे।

निष्कर्ष

शहीद भगत सिंह का संपूर्ण जीवन हम सभी को यह गहरी सीख देता है कि सच्ची क्रांति केवल हथियारों के बल पर नहीं, बल्कि दृढ़ वैचारिक स्पष्टता और अडिग सिद्धांतों से आती है। उनका भौतिक शरीर भले ही महज तेईस वर्ष की अल्पायु में मिट्टी में मिल गया हो, लेकिन उनके क्रांतिकारी विचार आज भी प्रत्येक भारतीय के दिल और दिमाग में पूरी तरह से अमर हैं। वे सही मायनों में भारत माता के ऐसे सच्चे और महान सपूत हैं, जिन्हें देश कभी भी भुला नहीं सकता है और उनका यह बलिदान युगों-युगों तक पूरे देशवासियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह ऐतिहासिक रिपोर्ट प्राप्त तथ्यों और दस्तावेजों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना और शैक्षणिक उद्देश्य से किया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी प्रकार के निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

Rex TV India Author:अजय त्यागी September 28, 2026: 11:57 AM © 2026 Rex TV India Contact @ 91 6376887816 | rextvindia@gmail.com
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