नई दिल्ली, नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पॉक्सो अधिनियम से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश कुमार शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट रूम का माहौल उस वक्त पूरी तरह से भावुक हो गया जब यह तथ्य सामने आया कि जिस वक्त उस मासूम के साथ यह घिनौना कृत्य किया गया था, तब दुष्कर्म पीडिता की उम्र महज 7 साल थी (और वर्तमान में वह 10 वर्ष की है)। सुनवाई के दौरान उस बच्ची की वह दर्द भरी अपील भी सामने आई, जिसमें उसने जज साहब से हाथ जोड़कर बेहद मार्मिक लहजे में गुहार लगाई थी कि जिस शख्स को वह अपना 'अंकल' मानती थी, उसे तब तक कालकोठरी से बाहर न निकाला जाए जब तक वह पूरी तरह बूढ़ा होकर तड़प-तड़प कर न मर जाए। पीडिता की इस कलेजा चीर देने वाली अपील ने सुनने वाले हर शख्स की आंखें नम कर दी थीं। उच्च न्यायालय ने इसी संवेदनशीलता को आधार बनाते हुए कड़ा आदेश दिया है कि निचली अदालत के जज द्वारा उस बच्ची के नाम लिखा गया वह विशेष संदेश और न्याय का भरोसा उस तक हर हाल में पहुंचना चाहिए। [1]
ट्रायल कोर्ट की महिला न्यायाधीश ने उस मासूम पीडिता बच्ची के इसी अदम्य साहस और उसकी उसी रूह को झकझोर देने वाली अपील का अपने फैसले में बेहद मार्मिक जिक्र किया था। न्यायाधीश ने अपने संदेश में पीडिता उस बच्ची के कलेजे पर मरहम रखते हुए लिखा कि यह अदालत भले ही उसका 7 साल की उम्र में छिन चुका बचपन वापस नहीं लौटा सकती, लेकिन उसने बच्ची की उस पुकार को सुन लिया है और पूरी ताकत से इंसाफ दिलाया है। न्यायाधीश ने कड़े और दो टूक शब्दों में यह सनसनीखेज बात लिखी कि उस दरिंदे को अब इस खुली दुनिया में कभी सांस लेने का हक नहीं होगा, वह उसी अंधेरे पिंजरे में बूढ़ा होगा और अपनी जिंदगी के आखिरी दिन सलाखों के पीछे ही काटेगा। बच्ची को अपने जिगर के टुकड़े जैसा 'बेटा' कहकर संबोधित करते हुए जज साहिबा ने बहुत ही स्नेह और दुलार के साथ उसे सलाह दी कि वह इन खौफनाक और कड़वी यादों के अंधेरे से बाहर निकले, अपनी इस नई जिंदगी की शानदार शुरुआत करे, स्कूल जाए और खेलकूद के साथ पढ़ाई में अपना उज्जवल भविष्य संवारे।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान इस कड़वे सच पर मुहर लगाई कि बाल अपराधों के मामलों में सिर्फ मुजरिम को जेल भेज देना ही काफी नहीं होता, बल्कि उस टूटे हुए और सहमे हुए बच्चे के मन से डर निकालकर उसके जख्मों पर मरहम रखना भी न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा धर्म है। उच्च न्यायालय ने संबंधित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को यह सख्त निर्देश दिया है कि वह महज दो सप्ताह के भीतर इस विशेष संदेश को उस पीडिता और उसके परिजनों के हाथों में सौंपे। इसके साथ ही पॉक्सो कानून के प्रावधानों के तहत तय की गई साढ़े दस लाख रुपये की भारी-भरकम मुआवजा राशि को भी पूरी पारदर्शिता के साथ सीधे पीड़िता के बैंक खाते या सुरक्षित संरक्षण में जमा कराने के सख्त आदेश जारी किए गए हैं। अदालत के इस दिल को छू लेने वाले और अपराधियों के लिए काल बने इस कड़े रुख की पूरे देश में जमकर वाहवाही हो रही है।
अदालत में सुनवाई के दौरान उस घिनौने अपराध के दोषी ठहराए गए शख्स के महंगे वकीलों ने अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए यह गिड़गिड़ाती हुई दलील दी थी कि उसकी बढ़ती उम्र और पारिवारिक मजबूरियों को देखते हुए उसकी सजा पर रोक लगाई जाए और उसे जमानत पर खुली हवा में छोड़ दिया जाए। हालांकि, दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले से जुड़े सभी फोरेंसिक सबूतों, मेडिकल रिपोर्टों और ट्रायल कोर्ट के दस्तावेजों में अंकित रोंगटे खड़े कर देने वाले ब्योरे का बारीकी से अध्ययन करने के बाद उस शातिर अपराधी की इस रहम की भीख वाली याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने दो टूक और गरजते हुए शब्दों में फैसला सुनाया कि ऐसे नासूर बन चुके दरिंदों और जघन्य अपराधियों के प्रति थोड़ी सी भी नरमी दिखाना पूरे सभ्य समाज के लिए एक बड़ा अभिशाप साबित हो सकता है, इसलिए दोषी को अपनी जिंदगी की आखिरी सांस तक कालकोठरी की दीवारों के पीछे ही सड़ना होगा।
इस रूहानी और बड़े मामले की अगली कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने तथा अदालत के आदेश का अक्षरशः पालन कराने के लिए उच्च न्यायालय ने संबंधित प्रशासनिक विभागों को एक निश्चित टाइमलाइन थमा दी है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को यह कानूनी रूप से जवाबदेह बनाया गया है कि वह जज साहब के उस ऐतिहासिक संदेश की सुपुर्दगी और मुआवजा राशि के वितरण की पल-पल की रिपोर्ट जल्द से जल्द अदालत के पटल पर पेश करे। देश के दिग्गज कानूनी विशेषज्ञों का एक सुर में यह मानना है कि उच्च न्यायालय का यह अनोखा और क्रांतिकारी निर्देश आने वाले समय में बच्चों के खिलाफ होने वाले ऐसे तमाम घिनौने अपराधों की सुनवाई के लिए एक मील का पत्थर और नजीर साबित होगा। कानून और समाज का यह ऐसा मजबूत मेल है जो अपराधियों की रूह कंपा देता है और पीड़ितों को यह अटूट भरोसा देता है कि देश का संविधान उनके साथ चट्टान की तरह खड़ा है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और आधिकारिक स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर पूरी तरह आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सामान्य सूचना और जागरूकता के उद्देश्य से किया गया है। इस प्रकरण से जुड़े किसी भी न्यायिक आदेश या तकनीकी विवरण में भविष्य में होने वाले बदलावों के लिए संबंधित न्यायालय का निर्णय ही अंतिम और सर्वमान्य होगा। इस रिपोर्ट में दी गई जानकारी के आधार पर लिए गए किसी भी प्रकार के निर्णय के लिए इसके लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।
Author:अजय त्यागी
September 29, 2026: 11:56 AM
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