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Rex TV India
Latest News दिल्ली Digital Newsletter 29 Sep 2026 · 5:22 PM

स्कूलों में रैगिंग रोकने के लिए केंद्रीय कानून की मांग: याचिका खारिज

प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली, नई दिल्ली। देश के शिक्षण संस्थानों में छात्रों के साथ होने वाली रैगिंग की कुप्रथा पर रोक लगाने और एक सख्त केंद्रीय कानून बनाने की मांग को लेकर दायर की गई याचिका पर शीर्ष अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में रैगिंग रोकने के लिए केंद्रीय कानून और देशव्यापी दिशा-निर्देश तैयार करने का अनुरोध करने वाली जनहित याचिका (PIL) पर विचार करने से साफ मना कर दिया है। अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि इस तरह के नीतिगत मामलों और विधायी क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने के बजाय अन्य वैधानिक निकायों और राज्य सरकारों के माध्यम से कदम उठाए जाने चाहिए, जिससे मौजूदा व्यवस्था पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े।  [1]

न्यायिक समीक्षा का दायरा

मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि स्कूलों में रैगिंग जैसे इस प्रकार के नीतिगत और प्रशासनिक निर्णयों के लिए संसद या संबंधित मंत्रालयों द्वारा कानून बनाया जाना विधायी प्रक्रिया के अंतर्गत आता है। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका हर उस विषय पर सीधे नियम या कानून नहीं बना सकती जो प्रशासनिक या कार्यकारी अधिकार क्षेत्र के अधीन आते हैं। इस याचिका में यह दलील दी गई थी कि देश भर के विभिन्न स्कूलों में रैगिंग के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे छात्रों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है। इसके मद्देनजर एक समान केंद्रीय कानून या व्यापक दिशा-निर्देशों का होना अनिवार्य बताया गया था, ताकि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

मौजूदा कानूनों की स्थिति

वर्तमान कानूनी ढांचे के तहत देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग पर रोक लगाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और अन्य वैधानिक निकायों के कड़े नियम लागू हैं, लेकिन स्कूली स्तर पर इसके लिए कोई एक केंद्रीय कानून मौजूद नहीं है। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क था कि स्कूली छात्र भी रैगिंग और मानसिक उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं, इसलिए उच्च शिक्षण संस्थानों की तर्ज पर स्कूलों में रैगिंग रोकने के लिए भी केंद्रीय स्तर पर विशेष दिशा-निर्देश जारी किए जाने चाहिए। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों पर विचार करते हुए कहा कि राज्य सरकारों और संबंधित बोर्डों के पास पहले से ही शिक्षण संस्थानों में अनुशासन बनाए रखने और छात्रों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रशासनिक शक्तियां मौजूद हैं, जिनका प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन किया जाना आवश्यक है।

कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियां

विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूली शिक्षा का विषय मुख्य रूप से राज्य सरकारों और विभिन्न शिक्षा बोर्डों (जैसे सीबीएसई, आईसीएससी और राज्य बोर्ड) के दायरे में आता है, जिसके कारण हर राज्य में नियम और परिस्थितियां भिन्न हो सकती हैं। एक केंद्रीय कानून बनाने से सभी राज्यों की स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्थाओं में टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। यही कारण है कि शीर्ष अदालत ने इस जनहित याचिका को तार्किक मानते हुए भी इसमें न्यायिक हस्तक्षेप करने से परहेज किया है। अदालत ने माना कि स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और रैगिंग जैसी गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए स्कूल प्रशासन, शिक्षकों और अभिभावकों को मिलकर सामूहिक प्रयास करने होंगे, ताकि छात्रों के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल शैक्षणिक वातावरण तैयार किया जा सके।

भविष्य की दिशा और निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि स्कूलों में रैगिंग रोकने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन, स्कूल प्रबंधन समितियों और राज्य सरकारों के कंधों पर ही बनी रहेगी। हालांकि, इस मामले ने एक बार फिर समाज और शिक्षाविदों के बीच यह बहस छेड़ दी है कि स्कूली बच्चों को मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से बचाने के लिए और अधिक ठोस तथा प्रभावी कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। देश के विभिन्न हिस्सों से समय-समय पर सामने आने वाली ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए केवल कानूनी प्रावधान ही नहीं, बल्कि नैतिक शिक्षा और सख्त आंतरिक निगरानी तंत्र का होना भी उतना ही जरूरी है, जिससे भविष्य में किसी भी छात्र को ऐसी प्रताड़ना का सामना न करना पड़े।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

Rex TV India Author:अजय त्यागी September 29, 2026: 5:22 PM © 2026 Rex TV India Contact @ 91 6376887816 | rextvindia@gmail.com
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