दीपावली का त्योहार हमारे जीवन में रोशनी, उल्लास और खुशियां लेकर आता है। घर-आंगन दीपों से जगमगाते हैं और लोग परिवार तथा मित्रों के साथ त्योहार का आनंद लेते हैं। लेकिन इसी समय बदलता मौसम और पटाखों से बढ़ने वाला वायु प्रदूषण कुछ लोगों के लिए स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती भी बन सकता है। विशेष रूप से अस्थमा, सीओपीडी, एलर्जी, पुरानी खांसी तथा अन्य सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित मरीजों को दीपावली के आसपास अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।
इस विषय में बीकानेर के पीबीएम अस्पताल के श्वसन रोग के प्रोफेसर डॉ राजेन्द्र सौगत कहते हैं कि अक्टूबर-नवंबर के दौरान मौसम में बदलाव के साथ तापमान में उतार-चढ़ाव शुरू हो जाता है। सुबह और रात में ठंड बढ़ने लगती है, जबकि दिन में अपेक्षाकृत गर्मी रह सकती है। इस बदलाव के साथ वातावरण में धूल, मिट्टी, परागकण और अन्य एलर्जी पैदा करने वाले तत्व भी सांस की बीमारी वाले लोगों की परेशानी बढ़ा सकते हैं। दीपावली के दौरान पटाखों से निकलने वाला धुआं इस समस्या को और गंभीर बना सकता है।
डॉ सौगत के अनुसार पटाखे जलने के बाद वातावरण में बहुत छोटे प्रदूषक कण और विभिन्न गैसें फैलती हैं। इनमें सूक्ष्म कण, विशेष रूप से PM2.5 और PM10, फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं। संवेदनशील लोगों में इनसे श्वसन मार्ग में जलन और सूजन बढ़ सकती है।
डॉ सौगत के अनुसार इसके कारण खांसी, गले में खराश, आंखों में जलन, नाक में जलन, सीने में जकड़न, सांस फूलना और सांस लेते समय घरघराहट जैसी शिकायतें हो सकती हैं। अस्थमा के मरीजों में प्रदूषण बीमारी के दौरे को ट्रिगर कर सकता है, जबकि सीओपीडी के मरीजों में सांस की तकलीफ और खांसी बढ़ सकती है।
यह समझना जरूरी है कि समस्या केवल पटाखे चलाने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती। हवा के साथ धुआं आसपास के पूरे क्षेत्र में फैलता है। इसलिए घर के बाहर पटाखे नहीं चलाने वाले व्यक्ति भी प्रदूषित हवा के संपर्क में आ सकते हैं।
बदलते मौसम को लेकर डॉ सौगत का कहना है कि सांस के मरीजों के लिए केवल दीपावली के दिन ही नहीं, बल्कि मौसम परिवर्तन के पूरे दौर में सावधानी जरूरी है। ठंडी हवा में अचानक जाने से कुछ मरीजों में खांसी और सांस फूलने की समस्या बढ़ सकती है। धूल और एलर्जी के कारण भी लक्षण उभर सकते हैं।
इसलिए मरीजों को अपनी नियमित दवाएं डॉक्टर की सलाह के अनुसार लेते रहना चाहिए। यदि डॉक्टर ने इनहेलर या अन्य दवा नियमित रूप से लेने की सलाह दी है तो केवल इसलिए उसे बंद नहीं करना चाहिए कि फिलहाल लक्षण कम हैं।
डॉ सौगत के अनुसार, इनहेलर को लेकर समाज में कई तरह की गलत धारणाएं भी देखने को मिलती हैं। वास्तव में उचित मरीज में डॉक्टर की सलाह से इनहेलर उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। मरीज को अपनी दवा या इनहेलर की मात्रा में बदलाव स्वयं नहीं करना चाहिए।
यदि सांस की परेशानी तेजी से बढ़ रही हो, मरीज को बोलने में कठिनाई हो रही हो, वह सामान्य रूप से चल या बैठ नहीं पा रहा हो, होंठ या चेहरा नीला पड़ने लगे, अत्यधिक सुस्ती या भ्रम की स्थिति हो अथवा निर्धारित दवा से राहत न मिले, तो इसे गंभीर स्थिति मानना चाहिए। ऐसे समय घरेलू उपचार या इंतजार करने के बजाय तुरंत नजदीकी अस्पताल या आपातकालीन चिकित्सा सेवा से संपर्क करना चाहिए।
इस विषय में डॉ सौगत का कहना है कि हमें अपनी सोच बदलने की जरूरत है। क्योंकि-
दीपावली रोशनी और खुशियों का पर्व है। हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि त्योहार की रोशनी किसी की सांसों के लिए परेशानी न बने। थोड़ी-सी सावधानी न केवल अस्थमा और सीओपीडी के मरीजों को अस्पताल जाने से बचा सकती है, बल्कि बच्चों, बुजुर्गों और स्वस्थ लोगों को भी अनावश्यक प्रदूषण से बचा सकती है।
इस दीपावली एक संकल्प लें—दीये ज्यादा जलाएं, धुआं कम करें; खुशियां ज्यादा बांटें, प्रदूषण कम करें।
स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें और दूसरों को भी स्वस्थ दीपावली मनाने का अवसर दें। यदि कोई मरीज सांस की बीमारी से पीड़ित हो तो उसे तुरंत प्रदूषण वाले इलाक़े से दूर हटाएं और हॉस्पिटल ले जाएं।
विशेष मुलाकात के अंश- डॉ राजेन्द्र सौगत
आचार्य, श्वसन रोग,
पीबीएम अस्पताल, बीकानेर।
Author:अजय त्यागी
October 7, 2026: 3:02 PM
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