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Rex TV India
Latest News प्रादेशिक Digital Newsletter 20 Oct 2026 · 2:30 PM

बातल दशहरा: बंदूक से फोड़ा जाता है पाप का घड़ा, 600 साल पुरानी परंपरा

प्रतीकात्मक फोटो

बातल, हिमाचल प्रदेश। बातल दशहरा अपनी करीब 600 साल पुरानी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है। अमर उजाला की 20 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, इस मेले में रावण दहन से पहले राज परिवार की ओर से बंदूक से पाप के घड़े को निशाना बनाया जाता है। इस परंपरा को असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक माना जाता है। सरकारी दस्तावेजों में इस उत्सव का उल्लेख वर्ष 1908 से मिलता है। दशहरे के अवसर पर आयोजित होने वाले इस मेले में दूरदराज के क्षेत्रों से लोग पहुंचते हैं। धार्मिक रस्मों, ऐतिहासिक मान्यताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के कारण इस आयोजन की अलग पहचान बनी हुई है।  [1]     [विडियो]

पुरानी परंपरा

बातल दशहरा में पाप का घड़ा फोड़ने की रस्म सबसे खास मानी जाती है। पंचायत प्रधान उर्मिला शर्मा के अनुसार, राजाओं के शासनकाल में रावण दहन के स्थान पर बंदूक से घड़े को निशाना बनाकर फोड़ने की परंपरा निभाई जाती थी। इस घड़े को पाप का प्रतीक माना जाता है और इसे तोड़ना बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है। आज भी राज परिवार इस परंपरा का निर्वहन करता है। इसके बाद दूसरे लोग भी निशाना लगाते हैं और अंत में रावण के पुतले का दहन किया जाता है। इसी अनूठे क्रम के कारण यह उत्सव दूसरे दशहरा आयोजनों से अलग नजर आता है।

पालकी की यात्रा

बातल दशहरा की शुरुआत भगवान लक्ष्मी नारायण की पालकी की शोभायात्रा से जुड़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक, दशहरे के अवसर पर अर्की बाजार स्थित मंदिर से ठाकुर जी की पालकी सजाकर यात्रा निकाली जाती है। यह शोभायात्रा गाहर होते हुए करीब 4 किलोमीटर लंबे जंगल के रास्ते बातल गांव पहुंचती है। गांव में ग्रामीण पालकी का स्वागत करते हैं और इसके बाद पूजा अर्चना तथा पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं। धार्मिक आस्था और सामुदायिक भागीदारी इस आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पालकी यात्रा मेले को केवल मनोरंजन का अवसर नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और पुरानी परंपराओं से जुड़ा धार्मिक आयोजन भी बनाती है।

मेले की रौनक

बातल दशहरा दो दिवसीय मेले के रूप में भी आकर्षण का केंद्र रहता है। दिन के समय खेल प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं, जबकि रात को सांस्कृतिक संध्याएं सजती हैं। इनमें स्थानीय कलाकारों के साथ दूसरे राज्यों से आने वाले कलाकार भी प्रस्तुति देते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, गजल गायक चंदन दास, अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन सहित कई कलाकार यहां कार्यक्रम पेश कर चुके हैं। प्रसिद्ध नृत्यांगना शोभना नारायण भी अपनी प्रस्तुति दे चुकी हैं। खेल, संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के मेल से मेले में उत्सव का माहौल बनता है। इन गतिविधियों के कारण धार्मिक आयोजन के साथ स्थानीय संस्कृति को मंच मिलता है और लोगों की भागीदारी बढ़ती है।

ऐतिहासिक पहचान

बातल दशहरा की पहचान इसके इतिहास और स्थानीय मान्यताओं से भी जुड़ी हुई है। स्थानीय निवासी शांति स्वरूप के अनुसार, क्षेत्र में रावण दहन की शुरुआत बातल से हुई थी और बाद में यह परंपरा अन्य स्थानों तक पहुंची। यह स्थानीय दावा है, जबकि मेले का सरकारी दस्तावेजों में उल्लेख 1908 से मिलता है। करीब 600 वर्षों से चली आ रही परंपरा, राज परिवार की भूमिका और पालकी यात्रा इस उत्सव को विशिष्ट बनाती हैं। हर साल यहां जुटने वाले लोग धार्मिक रस्मों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं। बातल दशहरा आज भी पुरानी परंपराओं को जीवित रखने और क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण आयोजन बना हुआ है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

 

 

Rex TV India Author:अजय त्यागी October 20, 2026: 2:30 PM © 2026 Rex TV India Contact @ 91 6376887816 | rextvindia@gmail.com
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