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Rex TV India
Latest News राजस्थान Digital Newsletter 20 Oct 2026 · 6:48 PM

मिट्टी का रावण बनाकर रौंदते हैं पहलवान, सदियों पुरानी है परंपरा

पैरों से रौंदा गया मिट्टी का रावण

कोटा, राजस्थान। दशहरे पर रावण दहन की परंपरा देशभर में प्रचलित है, लेकिन यहां जेठी समाज विजयदशमी को अलग तरीके से मनाता है। इस आयोजन में मिट्टी का रावण बनाकर उसे आग लगाने के बजाय पहलवान पैरों से रौंदकर उसका प्रतीकात्मक वध करते हैं। यह परंपरा कोटा के नांता और किशोरपुरा क्षेत्र के पारंपरिक अखाड़ों से जुड़ी है। इसका संबंध समाज की पहलवानी विरासत और बुराई पर अच्छाई की जीत के संदेश से है। इस अनूठे आयोजन में स्थानीय लोगों के साथ महिलाएं और बच्चे भी शामिल होते हैं। मिट्टी का रावण यहां दशहरे की विशिष्ट पहचान बन चुका है। [1]   [विडियो]   

परंपरा की तैयारी

जेठी समाज में मिट्टी का रावण बनाने की तैयारी नवरात्र के आरंभ के आसपास की जाती है। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, अखाड़े की मिट्टी से रावण की आकृति तैयार की जाती है। कुछ विवरणों में इसकी तैयारी श्राद्ध पक्ष से शुरू होने का उल्लेख मिलता है। मिट्टी में पारंपरिक धार्मिक सामग्री और गेहूं भी मिलाया जाता है, ताकि नवरात्र के दौरान ज्वार उग सके। इस प्रक्रिया में समाज के सदस्य मिलकर हिस्सा लेते हैं। मिट्टी का रावण तैयार करना केवल दशहरे की रस्म नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने का माध्यम भी है।

नवरात्र के दिनों में जेठी समाज के अखाड़ों में धार्मिक आयोजन और पारंपरिक गरबा भी होता है। महिलाएं और युवा पीढ़ी इस उत्सव में भाग लेकर अपनी सांस्कृतिक पहचान को आगे बढ़ाते हैं। विजयदशमी के दिन पहलवान मिट्टी के रावण को पैरों से रौंदकर प्रतीकात्मक वध की रस्म निभाते हैं। इसके बाद उसी मिट्टी पर पहलवानी का प्रदर्शन भी किया जाता है। इस आयोजन को देखने के लिए स्थानीय लोग और आसपास के क्षेत्रों से आए दर्शक जुटते हैं। मिट्टी का रावण जलाने के बजाय कुचलने की यह परंपरा सामान्य रावण दहन से अलग है और कोटा की स्थानीय संस्कृति में विशेष स्थान रखती है।

इतिहास और विरासत

जेठी समाज की इस परंपरा का संबंध हाड़ौती क्षेत्र के हाड़ा शासकों के दौर से बताया जाता है। प्रकाशित समाचार रिपोर्टों के अनुसार, तत्कालीन शासक कुश्ती के शौकीन थे और गुजरात से पहलवानों को कोटा बुलाते थे। पहलवानों की कुश्ती कला से प्रभावित होकर उन्हें यहां बसने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समाज की पहलवानी परंपरा से जोड़ा जाता है। हालांकि, इसकी शुरुआत की अवधि पर अलग अलग रिपोर्टों में अंतर है। कुछ इसे लगभग 150 साल पुरानी बताते हैं, जबकि अन्य में करीब 200 साल पुरानी परंपरा का उल्लेख मिलता है।

आज भी मिट्टी का रावण रौंदने की रस्म जेठी समाज की सामुदायिक पहचान और पूर्वजों की विरासत से जुड़ी हुई है। विजयदशमी पर आयोजन के बाद ज्वार वितरित करने और बुजुर्गों का आशीर्वाद लेने की परंपरा भी निभाई जाती है। धार्मिक गतिविधियों, गरबा और पहलवानी के मेल से यह आयोजन केवल रावण वध तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की एकजुटता को भी सामने लाता है। कोटा की यह परंपरा दर्शाती है कि दशहरा अलग अलग क्षेत्रों में स्थानीय इतिहास और सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार मनाया जाता है। मिट्टी का रावण यहां बुराई के प्रतीकात्मक अंत और पीढ़ियों से चली आ रही विरासत का अहम हिस्सा बना हुआ है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

 

Rex TV India Author:अजय त्यागी October 20, 2026: 6:48 PM © 2026 Rex TV India Contact @ 91 6376887816 | rextvindia@gmail.com
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