WA Join our WhatsApp Group
Advertisement Advertisement
← Back to article
Rex TV India
Latest News राजस्थान Digital Newsletter 26 Oct 2026 · 6:13 PM

पुस्तक समीक्षा में इतिहास, पर्यावरण और स्वतंत्र चिंतन की पड़ताल

पुस्तक समीक्षा

बीकानेर, राजस्थान। अजित फाउंडेशन की ओर से आयोजित पुस्तक समीक्षा कार्यक्रम में रामचंद्र गुहा की पुस्तक आखिरी उदारवादी और अन्य आलेख के बहाने स्वतंत्र चिंतन, इतिहास बोध और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर विमर्श हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कवि और विचारक डॉ. नंद किशोर आचार्य ने कहा कि गुहा की लेखकीय दृष्टि आंकड़ों के संकलन के बजाय व्यक्तियों के विचारों, उनके जीवन और वैचारिक योगदान को समझने पर केंद्रित है। पुस्तक जीवन को किसी एक विषय या अनुशासन में बांधकर देखने के बजाय उसकी समग्रता को पहचानने की प्रेरणा देती है। डॉ. आचार्य के अनुसार, मनुष्य की स्वतंत्रता और स्वतंत्र सोच इस कृति के महत्वपूर्ण मूल्य हैं। गांधी, नेहरू, विनोबा और अन्य विशिष्ट व्यक्तित्वों के माध्यम से लेखक ने विचारों की जीवंत दुनिया रची है।  [Video]

सेवाग्राम का संदर्भ

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि इतिहासकार डॉ. भंवर भादानी ने पुस्तक समीक्षा में सेवाग्राम के उल्लेख को गांधी के जीवन दर्शन से जोड़कर देखा। उन्होंने बताया कि सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद महात्मा गांधी ने सेवाग्राम में सादगी, निष्ठा और अनुशासन पर आधारित जीवन पद्धति अपनाई। यह आश्रम केवल निवास का स्थान नहीं था, बल्कि विचार और आचरण के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयोग भी था। डॉ. भादानी ने कहा कि राजनीति और विचारधारा की प्रकृति अलग होती है। राजनीतिक परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन जीवन को बेहतर बनाने वाली विचारधारा सत्ता परिवर्तन के बाद भी प्रासंगिक बनी रह सकती है। इसलिए उपयोगी विचारों और उनके सामाजिक उद्देश्यों को निरंतर आगे बढ़ाना चाहिए।

गांधीवादी विरासत

पुस्तक समीक्षा के अंतर्गत पुस्तक में संकलित सेवाग्राम संबंधी अध्याय की समीक्षा करते हुए महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय की इतिहास विभागाध्यक्ष और साहित्यकार डॉ. मेघना शर्मा ने इसे गांधीवादी विरासत के पुनर्मूल्यांकन का गंभीर बौद्धिक प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि यह अध्याय भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, गांधी की वैचारिक परिणति, आश्रम की नैतिक संरचना और आधुनिक भारत की सामाजिक सांस्कृतिक चेतना को एक साथ देखने का अवसर देता है। भीष्म साहनी और लुई फिशर के संस्मरणों के सहारे आश्रम का अनुशासित जीवन, सादा आवास, सीमित भोजन, व्यक्तिगत श्रम और सामुदायिक उत्तरदायित्व उभरकर सामने आते हैं। नेहरू, पटेल, जे. बी. कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, सरोजिनी नायडू और खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे नेताओं का सेवाग्राम पहुंचना गांधी के व्यापक राजनीतिक प्रभाव को रेखांकित करता है।

साहित्य की दुनिया

पुस्तक के साहित्य खंड पर समीक्षा प्रस्तुत करते हुए राजकीय डूंगर महाविद्यालय के हिंदी साहित्य के आचार्य डॉ. ब्रजरतन जोशी ने कहा कि गुहा साहित्य को केवल रचनात्मक सौंदर्य अथवा लेखक की उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखते। उनके लेख साहित्यकारों, अध्यापकों, आलोचकों, पत्रिकाओं, जीवनियों, आत्मकथाओं, पुस्तक दुकानों और पाठकीय संस्कृति के परस्पर संबंधों को सामने लाते हैं। इस दृष्टि में साहित्य कोई अलग थलग रचनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और बौद्धिक संसार है। लेखक, संपादक, प्रकाशक, आलोचक, पाठक और संस्थाएं मिलकर साहित्यिक प्रतिष्ठा तथा मान्यताओं का निर्माण करते हैं। डॉ. जोशी ने समाजशास्त्री पियरे बूर्दिए के विचारों से इसकी तुलना करते हुए बताया कि जहां बूर्दिए साहित्यिक क्षेत्र को प्रतिष्ठा और सत्ता के संघर्ष के रूप में देखते हैं, वहीं गुहा का स्वर अधिकतर सहानुभूतिपूर्ण स्मरण का रहता है। यही अंतर इस खंड की विशेषता और उसकी सीमा दोनों को सामने लाता है।

पर्यावरण की दृष्टि

पुस्तक समीक्षा कार्यक्रम में सिस्टर निवेदिता कॉलेज के प्राचार्य डॉ. रीतेश व्यास ने पर्यावरणविद अनिल अग्रवाल पर केंद्रित अध्याय की समीक्षा करते हुए उनके विचारों और योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अग्रवाल ने पर्यावरण संरक्षण की बहस में गरीब और वंचित समुदायों की भूमिका को प्रमुखता से स्थापित किया। चिपको आंदोलन से जुड़े अनुभवों ने यह समझ विकसित की कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी अनिवार्य है। डॉ. व्यास ने दिल्ली में वाहनों के लिए सीएनजी को बढ़ावा देने और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की स्थापना में अग्रवाल के योगदान का उल्लेख किया। जल, जंगल, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन उनके अध्ययन के प्रमुख विषय रहे। उन्होंने सुनीता नारायण और अनुपम मिश्र जैसे पर्यावरणविदों के साथ भी काम किया। महज 54 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन पर्यावरण संबंधी विमर्श में उनका योगदान महत्वपूर्ण बना हुआ है।

इतिहास और लोकतंत्र

इतिहास विषय के व्याख्याता डॉ. मुकेश हर्ष ने 'वाजपेयी की नजर में नेहरू' आलेख के संदर्भ में कहा कि किसी व्यक्ति के योगदान का महत्व केवल उसके समर्थकों की प्रशंसा से निर्धारित नहीं होता, बल्कि विरोधियों द्वारा उसके योगदान को स्वीकार करना भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने जोर दिया कि इतिहास का दायित्व किसी को पूर्णतः महान या दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर उसके विचारों और कार्यों का मूल्यांकन करना है। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद प्रतिद्वंद्वी के योगदान को समझना लोकतांत्रिक परिपक्वता का परिचायक है। डॉ. हर्ष ने कहा कि स्वतंत्र सोच, वैचारिक सहिष्णुता और असहमति के अधिकार का सम्मान समकालीन राजनीतिक विमर्श के लिए भी आवश्यक है। पुस्तक समीक्षा कार्यक्रम का संयोजन करते हुए संस्था समन्वयक संजय श्रीमाली ने कहा कि ऐसे आयोजनों का उद्देश्य आमजन में पुस्तक पढ़ने की प्रवृत्ति विकसित करना है। कार्यक्रम में मधु आचार्य, गजानंद व्यास, नदीम अहमद, माणक सुथार, महेश उपाध्याय, अविनाश व्यास, आनंद पुरोहित, जाकिर अदीब, सुनीता श्रीमाली, प्रमोद शर्मा, आनंद छंगाणी, उषा बिस्सा, दीक्षा व्यास, गोपाल व्यास, प्रवीण प्रजापत, मनीष जोशी, ओमप्रकाश सुथार और इमरोज नदीम सहित अनेक साहित्यकार एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट प्रेस विज्ञप्ति से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

 

 

Rex TV India Author:अजय त्यागी October 26, 2026: 6:13 PM © 2026 Rex TV India Contact @ 91 6376887816 | rextvindia@gmail.com
— End of Article —