संत विहार सुरक्षा अधिनियम की मांग को लेकर जैन समाज का विरोध प्रदर्शन
राजसमंद में जैन संतों की सुरक्षा को लेकर संत विहार सुरक्षा अधिनियम बनाने की मांग उठी है। समाज ने रीवा की घटना पर निष्पक्ष जांच मांगी है।
संत विहार सुरक्षा अधिनियम बनाने की मांग
राजसमंद (शिंभु सिंह शेखावत)। राजसमंद में महावीर मंच कांकरोली एवं सकल जैन समाज द्वारा आयोजित एक विरोध प्रदर्शन के दौरान संत विहार सुरक्षा अधिनियम बनाने की पुरजोर मांग की गई है। जैन समाज ने प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन जिला कलेक्टर को सौंपा है। इस ज्ञापन का मुख्य उद्देश्य देश भर में पदविहार कर रहे जैन संतों और आर्यिकाओं की सुरक्षा के लिए एक ठोस कानूनी ढांचे और विशेष प्रोटोकॉल को स्थापित करना है।
इस ज्ञापन के माध्यम से समाज ने अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि जैन संत पूरी तरह से अपरिग्रही और अहिंसक जीवन व्यतीत करते हैं, जो पैदल पदविहार करते हुए समाज का कल्याण करते हैं। ऐसी स्थिति में उनकी सुरक्षा करना न केवल नैतिक बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी भी है। समाज का मानना है कि वर्तमान सुरक्षा व्यवस्था अपर्याप्त है और इसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है।
रीवा की घटना
ज्ञापन में 20 मई 2026 को मध्य प्रदेश के रीवा में हुई हृदयविदारक घटना का जिक्र प्रमुखता से किया गया है। वहां आचार्य विद्यासागर महाराज की दीक्षित शिष्याएं, 105 आर्यिका श्रुतमती माताजी और 105 आर्यिका उपशममती माताजी पदविहार कर रही थीं। "तेज रफ्तार कार की टक्कर से दोनों आर्यिकाओं का निधन हो गया, जो समाज के लिए अपूरणीय क्षति है," ज्ञापन में इस घटना को संदिग्ध बताते हुए गहरा रोष व्यक्त किया गया है।
जैन समाज ने सरकार से इस दुखद हादसे की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग रखी है। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह केवल एक दुर्घटना नहीं हो सकती, इसकी गहराई से पड़ताल की जानी चाहिए। यदि इसके पीछे कोई षड्यंत्र है, तो दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। समाज इस मामले में किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
सुरक्षा प्रोटोकॉल
जैन समाज की मांगों में प्रमुख रूप से यह शामिल है कि पदविहार करने वाले संतों और साध्वियों के लिए संत विहार सुरक्षा अधिनियम बनाया जाए और एक विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू किया जाए। समाज चाहता है कि संबंधित थाना क्षेत्रों को यह जिम्मेदारी सौंपी जाए कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले संतों की सुरक्षा की निगरानी करें। "पूरी सुरक्षा व्यवस्था को जिला प्रशासन की देखरेख में रखा जाए ताकि ऐसी अनहोनी फिर न हो," समाज का कहना है।
इसके साथ ही, संतों और आर्यिकाओं के रात्रि विश्राम या ठहरने की व्यवस्था को लेकर भी ठोस कदम उठाने की मांग की गई है। समाज का सुझाव है कि शासकीय भवनों, विद्यालयों, या सार्वजनिक सुरक्षित स्थानों पर संतों के लिए उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। खुले में रुकने की तुलना में यह सुरक्षित भवनों का विकल्प उनके संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
अधिनियम की मांग
भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए केंद्र सरकार से संत विहार सुरक्षा अधिनियम लागू करने की मांग की गई है। समाज का मानना है कि एक केंद्रीय कानून ही देशभर के संतों को एक समान सुरक्षा कवच प्रदान कर सकता है। यह अधिनियम न केवल सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि कानून का उल्लंघन करने वालों के लिए कठोर दंड के प्रावधान भी तय करेगा।
राजसमंद जैन समाज का यह कदम पूरे देश में एक नई चेतना जगाने वाला है। समाज के पदाधिकारी ने कहा, "हमारी मांग है कि शासन इस मुद्दे को गंभीरता से ले और जल्द से जल्द एक नीति तैयार करे।" यह अधिनियम केवल एक कागजी दस्तावेज नहीं, बल्कि संतों के प्रति शासन की जवाबदेही तय करने का एक प्रभावी माध्यम बनेगा, जिससे भविष्य में ऐसी दुखद स्थितियों से बचा जा सकेगा।
जिम्मेदारी और प्रशासन
प्रशासन की भूमिका पर चर्चा करते हुए समाज ने यह रेखांकित किया कि जब संत पदविहार पर होते हैं, तो वे पूरी तरह से जनसहयोग और शासन की सुरक्षा पर निर्भर होते हैं। किसी भी वाहन द्वारा होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सड़कों पर विशेष चेतावनी बोर्ड और निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए। संतों की पदयात्रा को एक धार्मिक गतिविधि के रूप में सरकारी संरक्षण मिलना ही समय की सबसे बड़ी मांग है।
अंत में, जैन समाज ने स्पष्ट किया कि जब तक सरकार इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाती और संत विहार सुरक्षा अधिनियम के माध्यम से संतों को सुरक्षा प्रदान नहीं करती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से इस विषय में व्यक्तिगत हस्तक्षेप की उम्मीद जताई है ताकि संतों और साध्वियों का विहार सुरक्षित और निर्बाध रूप से संपन्न हो सके।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
इस रिपोर्ट में दी गई जानकारी विश्वसनीय समाचार स्रोतों और स्थानीय जैन समाज द्वारा दिए गए ज्ञापन के विवरणों पर आधारित है। सरकारी नीतियां और अधिनियम परिवर्तन के अधीन हो सकते हैं। अतः किसी भी प्रकार का अंतिम निर्णय लेने से पूर्व संबंधित सरकारी विभाग से जानकारी की पुष्टि अवश्य करें। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं होंगे।