ईद-उल-अजहा (बकरीद) पर अकिदतमंदों ने की विश्व शांति की कामना
ईद-उल-अजहा (बकरीद) पर अकिदतमंदों ने की विश्व शांति की कामना। कुर्बानी और भाईचारे का यह पर्व पूरी दुनिया में शांति का संदेशवाहक है।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
ईद-उल-अजहा (बकरीद) का पावन पर्व आज पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस्लामिक परंपराओं के अनुसार, इसे 'कुर्बानी की ईद' के रूप में जाना जाता है, जो हजरत इब्राहिम के अपने बेटे को खुदा की राह में कुर्बान करने के संकल्प की याद दिलाता है। सालाना हज यात्रा के समापन के साथ ही यह पर्व पूरी दुनिया के मुसलमानों को शांति और समर्पण का संदेश देता है।[1]
आज के दिन सुबह की विशेष नमाज के साथ ही ईद-उल-अजहा (बकरीद) की रस्में शुरू हो जाती हैं। मस्जिदों में अकीदतमंदों की भारी भीड़ उमड़ती है, जहाँ विश्व की शांति और समृद्धि के लिए विशेष दुआएं मांगी जाती हैं। इबादत का यह सिलसिला ही इस त्योहार की असली रूह है। नमाज के बाद लोग एक-दूसरे को गले मिलकर मुबारकबाद देते हैं, जो आपसी भाईचारे के बंधन को मजबूत करता है।
कुर्बानी का जज्बा
इस पर्व की सबसे मुख्य कड़ी 'कुर्बानी' है, जो अल्लाह की राह में अपनी सबसे प्रिय वस्तु को समर्पित करने का प्रतीक है। इस बारे में धार्मिक विद्वानों का मानना है कि:
"कुर्बानी का अर्थ केवल पशु का बलिदान नहीं, बल्कि अपने अहंकार को त्यागकर अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण और जरूरतमंदों की मदद करने का जज्बा है।"
वित्तीय रूप से सक्षम लोग इस दिन भेड़, बकरी या अन्य स्वीकार्य पशुओं की कुर्बानी देते हैं। इस रस्म में मांस का वितरण अत्यंत अनुशासित तरीके से किया जाता है। इसके तीन बराबर हिस्से किए जाते हैं: पहला हिस्सा अपने परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए, और तीसरा हिस्सा समाज के गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए समर्पित किया जाता है। यह भावना समाज में आर्थिक समानता का संदेश देती है।
अराफात का महत्व
ईद-उल-अजहा (बकरीद) शुरू होने से ठीक एक दिन पहले अराफात का दिन आता है, जिसे इस्लामिक आस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। हज यात्री इस दिन अराफात के मैदान में एकत्र होकर खुदा की इबादत करते हैं और अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। अराफात का यह दिन रूहानी सुकून और तौबा के लिए जाना जाता है, जो अगले दिन आने वाले उल्लास के लिए माहौल तैयार करता है।
दुनिया भर में चांद के दीदार के अनुसार तिथियों में भिन्नता हो सकती है। मिडिल ईस्ट और पश्चिमी देशों में जहाँ यह पर्व 27 मई से शुरू हुआ है, वहीं भारत में इसका मुख्य आयोजन 28 मई को हो रहा है। हालाँकि, कुछ क्षेत्रों जैसे जम्मू-कश्मीर में 27 मई को ही पर्व मनाया गया है। यह क्षेत्रीय अंतर चंद्र कैलेंडर की प्रकृति के कारण स्वाभाविक है, लेकिन भावनाओं और परंपराओं में पूरी दुनिया में एकरूपता बनी हुई है।
भाईचारे का संदेश
यह त्योहार केवल दावत और उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परोपकार का संदेश देता है। ईद-उल-अजहा (बकरीद) हमें सिखाती है कि हमारा जीवन समाज के उन लोगों के प्रति भी जिम्मेदार है जो संसाधनों के अभाव में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इस दिन घरों में बनने वाले लजीज पकवानों का आनंद रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ साझा किया जाता है, जिससे रिश्तों में मिठास और आपसी सहयोग की भावना प्रबल होती है।
आज के आधुनिक युग में भी, इस त्योहार की परंपराएं अपरिवर्तित हैं। लोग अपने व्यस्त जीवन से समय निकालकर अपनों के साथ वक्त बिताते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि आस्था और मानवता एक-दूसरे के पूरक हैं। जिस प्रकार हजरत इब्राहिम ने खुदा के हुक्म को शिरोधार्य किया था, उसी तरह आज का मुसलमान भी अपने कर्तव्यों और नेक कार्यों के माध्यम से समाज में शांति और अमन का संदेश फैला रहा है।
अंत में, यह पर्व हमें एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है। ईद-उल-अजहा (बकरीद) हमें अहंकार छोड़ने, दूसरों की मदद करने और समाज में समानता लाने का मार्ग दिखाती है। चाहे वह कुर्बानी का वितरण हो या गरीबों को भोजन कराना, हर कदम खुदा की रजा हासिल करने और मानवता की सेवा की ओर है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि खुशियां बांटने से बढ़ती हैं और समर्पण से ही रूहानी सुकून मिलता है।
श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर: हज़रतबल दरगाह पर ईद की सामूहिक नमाज़ अदा की गई, जिसमें मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला शामिल हुए। pic.twitter.com/FUQuoiZrpB
— IANS Hindi (@IANSKhabar) May 27, 2026