भीलवाड़ा में पेयजल संकट और प्रशासन की सुस्ती पर कड़े निर्देश
भीलवाड़ा में पेयजल संकट और प्रशासन की कार्यप्रणाली के बीच विधायक ने अधिकारियों की बैठक लेकर जलापूर्ति सुचारु करने के कड़े निर्देश जारी किए हैं।
कार्यालय में एक महत्वपूर्ण बैठक
भीलवाड़ा, राजस्थान (पंकज पोरवाल)। भीलवाड़ा में पेयजल संकट और प्रशासन की उदासीनता का मुद्दा एक बार फिर तूल पकड़ता नजर आ रहा है। भीषण गर्मी के बीच आम नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं, जबकि सरकारी तंत्र फाइलों में सब कुछ दुरुस्त होने का दावा कर रहा है। इसी बीच, स्थानीय विधायक अशोक कुमार कोठारी ने मोर्चा संभालते हुए जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) और चंबल परियोजना के अधिकारियों के साथ अपने कार्यालय में एक महत्वपूर्ण बैठक की। इस बैठक का मुख्य एजेंडा शहर और आसपास के क्षेत्रों में पानी की किल्लत को तत्काल समाप्त करना था।
प्रचंड गर्मी के दौर में जब आमजन का गला सूख रहा है, तब प्रशासनिक सुस्ती किसी बड़ी आपदा से कम नहीं है। विधायक ने अधिकारियों को स्पष्ट शब्दों में चेताया है कि जलापूर्ति व्यवस्था में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। भीलवाड़ा में पेयजल संकट और प्रशासन के बीच यह रस्साकशी जनता के लिए कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार तेवर सख्त नजर आ रहे हैं। क्या यह केवल एक औपचारिक बैठक बनकर रह जाएगी या धरातल पर पानी की किल्लत वास्तव में दूर होगी, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
जलापूर्ति पर कड़ी निगरानी
विधायक अशोक कुमार कोठारी ने बैठक में जोर देकर कहा कि भीलवाड़ा में पेयजल संकट और प्रशासन के तालमेल में कमी के कारण ही स्थितियां बिगड़ रही हैं। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि जलापूर्ति व्यवस्था पर अधिकारियों को लगातार निगरानी रखनी होगी। जहां कहीं भी जल संकट की शिकायतें मिल रही हैं, वहां त्वरित समाधान के लिए टीम को सक्रिय किया जाए। अक्सर देखा जाता है कि कागजों में पानी की आपूर्ति पूरी दिखाई जाती है, लेकिन हकीकत में नलों तक पानी नहीं पहुंचता।
सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली अक्सर घोषणाओं तक ही सीमित रहती है। अधिकारी बैठक में तो सब कुछ ठीक होने का आश्वासन दे देते हैं, लेकिन जमीन पर आम आदमी को टैंकरों के भरोसे ही जीना पड़ता है। भीलवाड़ा में पेयजल संकट और प्रशासन के इस चक्रव्यूह में आम आदमी ही सबसे ज्यादा पिसता है। यदि अधिकारियों ने समय रहते अपनी कार्यशैली नहीं बदली, तो आने वाले दिनों में यह संकट और भी विकराल रूप ले सकता है।
प्राचीन जल स्रोतों का संरक्षण
बैठक के दौरान विधायक ने "वंदे गंगा जल जन अभियान" का उल्लेख करते हुए प्राचीन जलाशयों, बावड़ियों और कुओं को पुनः जीवित करने का बड़ा संकल्प लिया है। पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण करना वास्तव में समय की मांग है, क्योंकि केवल चंबल परियोजना पर निर्भरता बढ़ती आबादी के सामने कम पड़ रही है। उन्होंने इन जल स्रोतों को उपयोगी बनाने के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं ताकि जल स्वावलंबन की ओर कदम बढ़ाया जा सके।
"प्रचंड गर्मी के इस दौर में आमजन को किसी प्रकार की पेयजल समस्या का सामना नहीं करना पड़े, इसके लिए जल वितरण व्यवस्था पर लगातार निगरानी रखी जाए और जहां कहीं जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो, वहां तत्काल समाधान किया जाए।"
राजनीतिक मंच से इस तरह के अभियान चलाना सराहनीय है, लेकिन इन योजनाओं का क्रियान्वयन अक्सर नौकरशाही की फाइलों में दबकर रह जाता है। भीलवाड़ा में पेयजल संकट और प्रशासन की मिलीभगत या उदासीनता को दूर करने के लिए केवल अभियानों की नहीं, बल्कि ठोस इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। देखना यह है कि यह बैठक व्यवस्था में कितना बड़ा बदलाव लाती है या फिर यह भी अन्य बैठकों की तरह केवल एक सरकारी औपचारिकता बनकर सिमट जाती है।