मनरेगा मजदूरों का प्रदर्शन: रोजगार के लिए सड़क पर उतरे श्रमिक
मनरेगा मजदूरों का प्रदर्शन अब चरम पर है, जहाँ न्यौराणा में काम न मिलने और भेदभाव से नाराज श्रमिकों ने पंचायत कार्यालय पर ताला जड़ दिया है।
मनरेगा मजदूरों का प्रदर्शन
पाटन, राजस्थान (शिंभू सिंह शेखावत)। मनरेगा मजदूरों का प्रदर्शन न्यौराणा ग्राम पंचायत में उस समय हिंसक रूप ले लिया जब लंबे समय से रोजगार की बाट जोह रहे श्रमिकों का धैर्य जवाब दे गया। भीषण आर्थिक संकट और परिवार की भूख से जूझ रहे इन मजदूरों ने जब पंचायत कार्यालय के मुख्य द्वार पर ताला जड़ा, तो प्रशासन की कार्यप्रणाली पर खड़े हो रहे सवालों को एक नई दिशा मिल गई। आसपास की पंचायतों में मनरेगा का काम निरंतर चल रहा है, लेकिन यहाँ की व्यवस्था 'चुनिंदा लोगों' तक ही सीमित होकर रह गई है, जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की बू देती है।
श्रमिकों का स्पष्ट आरोप है कि सरपंच और ग्राम विकास अधिकारी की मिलीभगत से मनरेगा लेबर के साथ भेदभाव किया जा रहा है। बार-बार काम बंद कर देना या फिर केवल अपने चहेतों को ही मजदूरी का लाभ पहुँचाना, यह दर्शाता है कि सरकारी खजाने का बंदरबांट किस तरह किया जा रहा है। मजदूरों का कहना है कि वे बार-बार गुहार लगा चुके हैं, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। अब जब काम बंद है और जॉब कार्डधारी मजदूर खाली हाथ बैठे हैं, तो उनके सामने पलायन के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा है।
भेदभाव की राजनीति
मनरेगा मजदूरों का प्रदर्शन इस बात का आईना है कि कैसे एक कल्याणकारी योजना को स्थानीय स्तर पर राजनीति का अखाड़ा बना दिया गया है। जब संवैधानिक अधिकार के तहत मिलने वाले रोजगार में भी 'पसंदीदा लोगों' को तरजीह दी जाने लगे, तो यह व्यवस्था की विफलता का ही संकेत है। आखिर कौन सी मजबूरी या कौन सा दबाव है कि न्यौराणा के मजदूरों को उनके अधिकार से वंचित रखा जा रहा है? स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की चुप्पी भी कई बड़े सवाल खड़े करती है।
यदि काम है तो फिर केवल कुछ ही लोगों को क्यों दिया जा रहा है? यह भेदभाव न केवल नियमों के विरुद्ध है, बल्कि मानवता के खिलाफ भी है। मनरेगा मजदूरों का प्रदर्शन केवल एक पंचायत की घटना नहीं है, बल्कि यह उन तमाम पंचायतों की सच्चाई है जहाँ मनरेगा के नाम पर केवल खानापूर्ति होती है। यदि सरपंच और ग्राम विकास अधिकारी की भूमिका निष्पक्ष नहीं है, तो प्रशासन को तुरंत प्रभाव से इनकी कार्यप्रणाली की गहन जांच करनी चाहिए।
प्रशासन की बड़ी जिम्मेदारी
आक्रोशित मजदूरों ने चेतावनी दी है कि जब तक उन्हें नियमित काम नहीं मिलेगा, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने प्रशासन से न्यौराणा पंचायत में मनरेगा कार्यों की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। सरकार दावे तो बड़े-बड़े करती है, लेकिन उन दावों का क्या अर्थ जब ग्रामीण अपने ही हक के लिए पंचायत के ताले तोड़ने पर मजबूर हो जाएं? यह प्रशासन की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह जल्द से जल्द इस गतिरोध को खत्म करे और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करे।
इस पूरे प्रकरण में जिस तरह का आक्रोश दिख रहा है, वह किसी भी बड़े सामाजिक विस्फोट का कारण बन सकता है। मनरेगा मजदूरों का प्रदर्शन परोक्ष रूप से इस बात का संकेत है कि जनता अब और अधिक शोषण बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। क्या प्रशासन को इस आंदोलन के गंभीर होने का इंतजार है या समय रहते वे इस भेदभाव की राजनीति पर लगाम लगाएंगे? यह आने वाला वक्त ही तय करेगा कि यहाँ के जनप्रतिनिधि जनता के सेवक हैं या केवल अपने पद का दुरुपयोग करने वाले।