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प्रादेशिक

अवैध निर्माण ध्वस्तीकरण: विकास के नाम पर बेघर होते लोग

अवैध निर्माण ध्वस्तीकरण अभियान ने छीने आशियाने, विकास के नाम पर बेघर हुए लोग। विकास की यह अजीबोगरीब परिभाषा समझ से परे है।

By अजय त्यागी
1 min read
अवैध निर्माण ध्वस्तीकरण

अवैध निर्माण ध्वस्तीकरण

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(गांधीनगर, गुजरात)। अवैध निर्माण ध्वस्तीकरण जब विकास की दुंदुभी बजाकर किया जाता है, तो शहर की फिज़ाओं में ईंट-पत्थरों के टूटने की आवाज़ें किसी बड़े उत्सव जैसी महसूस होती हैं। मोटेरा स्थित आसाराम बापू आश्रम के समीप नगर निगम के बुलडोजरों ने 37 अवैध आवासीय ढांचों को देखते ही देखते ज़मींदोज़ कर दिया। प्रशासन का तर्क है कि यह ज़मीन खाली करना आगामी खेल बुनियादी ढांचों और सार्वजनिक विकास परियोजनाओं के लिए अनिवार्य था। यह विकास का वह अध्याय है जहाँ नींव मज़बूत करने के लिए पुराने घर ढहाना ज़रूरी माना गया।(1)

शहर में विकास की यह अनोखी परिभाषा उन लोगों के लिए किसी सदमे से कम नहीं है, जिन्होंने अपनी जमा-पूँजी लगाकर यहाँ छतें बनाई थीं। डीसीपी भरत राठौड़ के अनुसार, यह पूरी कार्रवाई कानूनी औपचारिकताओं, नोटिस और परामर्श के बाद की गई थी। चार पुलिस टीमों और लगभग 125 जवानों की भारी सुरक्षा के बीच, यह ऑपरेशन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। प्रशासन का दावा है कि स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में थी, लेकिन क्या उन लोगों का नियंत्रण भी अपने भविष्य पर था, जिनके सिर से छत छीन ली गई?

विकास की अजीब परिभाषा

अवैध निर्माण ध्वस्तीकरण का अर्थ विकास है या विनाश, यह बहस आज भी अनुत्तरित है। जब विकास की बात आती है तो सुनकर अच्छा लगता है कि किसी के पास तो समय है आम जनता की सुध लेने का। लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि खेल संसाधन ही विकसित करने हैं, तो उसके लिए यही स्थान क्यों ज़रूरी है? दूसरा बड़ा सवाल यह है कि क्या आम आदमियों के आशियाने गिराकर कुछ विशेष लोगों के लिए सुविधा करना ही विकास का एकमात्र मानदंड है?

प्रशासन ने पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया है और प्रभावित पक्षों के साथ उचित परामर्श के बाद ही यह कदम उठाया गया है, ताकि विकास परियोजनाओं में कोई बाधा न आए भले ही यहां के वाशिंदों के सारे सपने चूर-चूर हो जाएं, सब जमा पूंजी धूल में मिल जाए।

यह प्रशासनिक तर्क सुनने में जितने औपचारिक हैं, ज़मीनी हकीकत उतनी ही कड़वी है। सुनने में आ रहा है कि सरकार इनके पुनर्वास के लिए कुछ सोच रही है। तो क्या यह बेहतर नहीं होता कि इनसे आवश्यक शुल्क यानी भूमि की बाज़ार कीमत लेकर इन्हें वहीं रहने दिया जाता और खेल संसाधनों के लिए अन्यत्र कहीं व्यवस्था कर ली जाती? खैर, शायद इसीलिए कहा गया है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस। बहरहाल, विकास की यह अजीबोगरीब परिभाषा आम आदमी की समझ से परे है।

जमींदोज हुए सपनों का मंजर

अवैध निर्माण ध्वस्तीकरण की यह प्रक्रिया केवल ईंट-गारे को गिराने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी सोच को भी दर्शाती है जिसमें विकास के नक्शे पर आम आदमी के आशियानों को महज एक अतिक्रमण मान लिया जाता है। खेल की दुनिया में बड़े-बड़े कीर्तिमान स्थापित करने के लिए जिस ज़मीन की ज़रूरत थी, उसने 37 परिवारों के सपनों को ढहा दिया। यह विकास किसी को बड़े खिलाड़ी बनाने के सपने दिखा रहा है, तो किसी को बेघर होने का कड़वा सच।

अंतिम विश्लेषण में, यह विकास का वह चेहरा है जो चमकता तो है, लेकिन उसके पीछे छिपी खामोशी उन लोगों की चीखों से भरी है जिनकी दुनिया बुलडोजर के एक झटके में सिमट गई। यदि अवैध निर्माण ध्वस्तीकरण का नाम ही दूसरों को उजाड़ना है, तो हम किस प्रगति के युग में जी रहे हैं? प्रशासनिक कुशलता और मानवीय संवेदनशीलता के बीच की यह बारीक रेखा अब धुंधली हो चुकी है, जहाँ न्याय की परिभाषा भी ज़मीन के टुकड़ों के हिसाब से बदलती नज़र आती है।

अस्वीकरण:

यह रिपोर्ट प्राप्त तथ्यों पर आधारित है और केवल सूचनात्मक उद्देश्य से है। प्रशासन की कार्यप्रणाली और विकास परियोजनाओं से जुड़ी कानूनी स्थिति संवेदनशील हो सकती है। लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी प्रकार की होने वाली हानि के लिए उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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