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दिल्ली

सीबीएसई तीन भाषा फार्मूला: 1 जुलाई से लागू, स्कूलों में हड़कंप

सीबीएसई तीन भाषा फार्मूला कक्षा 9वीं में 1 जुलाई 2026 से लागू होने जा रहा है। विशेषज्ञों और अभिभावकों ने तैयारी के अभाव में इस बड़े बदलाव पर गहरी चिंता जताई है।

By अजय त्यागी
1 min read
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

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नई दिल्ली, भारत। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने कक्षा नौवीं के छात्रों के लिए 1 जुलाई, 2026 से सीबीएसई तीन भाषा फार्मूला लागू करने का निर्णय लिया है। इस फैसले ने शिक्षकों, स्कूलों और अभिभावकों के बीच चिंता पैदा कर दी है। हितधारकों का कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (एनसीएफएसई) 2023 के तहत पेश किया गया यह बदलाव शैक्षिक उद्देश्यों के बावजूद पर्याप्त तैयारी के बिना किया जा रहा है।[1]

सीबीएसई तीन भाषा फार्मूला का उद्देश्य बहुभाषावाद को बढ़ावा देना और भाषाई विविधता को प्रोत्साहित करना है। हालांकि, इतने बड़े शैक्षिक बदलाव को शैक्षणिक सत्र के बीच में लागू करने की जल्दबाजी पर सवाल उठाए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि छात्रों पर पढ़ाई का दबाव बढ़ सकता है और स्कूलों को नई व्यवस्था के अनुसार खुद को ढालने के लिए समय की कमी का सामना करना पड़ रहा है।

भाषाई मुक्ति का दावा

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस नीति का पुरजोर बचाव किया है और इसे भाषाई थोपे जाने के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। ईटीवी भारत की एक रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने एनईपी को "भाषाई मुक्ति" का साधन बताते हुए कहा कि यह मातृभाषा में शिक्षा को प्रोत्साहित करती है, साथ ही वैश्विक स्तर पर आवश्यक बहुभाषी कौशल भी प्रदान करती है।

प्रधान ने तर्क दिया कि सीबीएसई तीन भाषा फार्मूला को अनिवार्य हिंदी के रूप में दिखाना भ्रामक है, क्योंकि बहुभाषावाद क्षेत्रीय भाषाओं को मजबूत करेगा। उन्होंने कहा कि एनईपी सभी भारतीय भाषाओं को समान महत्व देती है और इसे समग्र शिक्षा जैसी योजनाओं के तहत शिक्षक प्रशिक्षण और संस्थागत मजबूती का समर्थन प्राप्त है। सरकार के अनुसार यह कदम छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करने हेतु उठाया गया है।

अकादमिक बोझ पर चिंता

सिद्धांत रूप में बहुभाषी सीखने का व्यापक समर्थन करने के बावजूद, कई शिक्षाविदों ने सीबीएसई तीन भाषा फार्मूला के समय और प्रभाव पर चिंता जताई है। स्टेट प्लेटफॉर्म फॉर कॉमन स्कूल सिस्टम-तमिलनाडु के महासचिव पी बी प्रिंस गजेंद्र बाबू का कहना है कि भाषा संस्कृति और पहचान से जुड़ी होती है, जिससे मातृभाषा सीखने का सबसे स्वाभाविक माध्यम बन जाती है।

बाबू के अनुसार, बच्चे पहले से ही अपनी मूल भाषा के साथ अंग्रेजी सीख रहे हैं, जो कई राज्यों में द्विभाषी मॉडल का आधार है। उन्होंने तर्क दिया कि एक तीसरी भाषा जो बच्चे के दैनिक वातावरण का हिस्सा नहीं है, वह अतिरिक्त शैक्षणिक तनाव पैदा कर सकती है। साथ ही, उन्होंने चिंता जताई कि तीसरी भाषा के लिए आवंटित समय शारीरिक शिक्षा, खेल, कंप्यूटर विज्ञान और पुस्तकालय गतिविधियों के खर्च पर आएगा।

व्यावहारिक चुनौतियों का सामना

स्कूल प्रशासकों और अकादमिक योजनाकारों का कहना है कि सबसे बड़ी चिंता नीति नहीं, बल्कि इसे लागू करने की गति है। सेंट थॉमस स्कूल, गाजियाबाद के मुख्य अकादमिक सलाहकार कुरियाकोस वी के ने कहा कि हितधारकों ने कक्षा छठी से सीबीएसई तीन भाषा फार्मूला ढांचा शुरू करने के पिछले प्रस्ताव का स्वागत किया था।

कुरियाकोस ने चेतावनी दी कि विदेशी भाषा के शिक्षकों के रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं, जबकि विदेशी भाषाओं में करियर बनाने के इच्छुक छात्र वंचित रह सकते हैं। <समाचार एजेंसी> की एक रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि बिना किसी तैयारी, जमीनी काम और पर्याप्त समय के लिया गया कोई भी जल्दबाजी भरा निर्णय भ्रम और खराब परिणामों को जन्म देगा।

अभिभावकों की बढ़ी बेचैनी

अभिभावकों ने भी सीबीएसई तीन भाषा फार्मूला के फैसले के समय पर सवाल उठाए हैं, उनका कहना है कि इससे शैक्षणिक योजनाएं पूरी तरह बिगड़ गई हैं। गुरुग्राम में पढ़ने वाले छात्र के पिता प्रेम शर्मा ने कहा कि छात्रों को भाषा चुनने की आजादी होनी चाहिए, न कि उन पर बदलाव थोपे जाने चाहिए।

अभिभावक स्नेहा बंसल ने बताया कि सीबीएसई ने पहले संकेत दिया था कि यह शर्त 2029-30 सत्र तक लागू नहीं होगी। अचानक हुए इस बदलाव ने छात्रों और अभिभावकों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। इसी तरह के विचार अन्य अभिभावकों ने भी रखे हैं, जिन्होंने इसे बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी के दौरान अतिरिक्त दबाव बताया है।

राजनीतिक विरोध और बहस

यह नीति भाषा और शिक्षा पर जारी राजनीतिक बहस का एक प्रमुख मुद्दा बन गई है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल पर संसदीय स्थायी समिति के प्रमुख दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इसे टालने की मांग की है।

सिंह ने चेतावनी दी कि बिना पर्याप्त शिक्षकों और पाठ्यपुस्तकों के इसे लागू करना सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली जैसी समस्याओं को दोहरा सकता है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बोर्ड की पिछली स्थिति और नवीनतम निर्देश के बीच विरोधाभास की ओर भी इशारा किया है। वहीं, पूर्व यूजीसी अध्यक्ष एम जगदा जगदीश कुमार ने सीबीएसई तीन भाषा फार्मूला का समर्थन किया है और इसे संज्ञानात्मक विकास के लिए फायदेमंद बताया है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसी एवं स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। सीबीएसई तीन भाषा फार्मूला से जुड़ी यह कार्रवाई प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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