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समीक्षा

जलवायु परिवर्तन का खतरा: कहीं विनाश को निमंत्रण तो नहीं

वैज्ञानिक शोध में पर्माफ्रॉस्ट के लगातार पिघलने का दावा किया गया है जिससे पहाड़ी ढलानों पर भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसे जलवायु परिवर्तन का खतरा गहरा गया है।

By अजय त्यागी
1 min read
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

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किन्नौर, हिमाचल प्रदेश। किन्नौर में कई दशकों से तापमान बढ़ने के कारण भूमि के भीतर स्थायी रूप से जमी बर्फ यानी पर्माफ्रॉस्ट पिघलने लगी है। इससे भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बहुत तेजी से बढ़ गया है। जिले में पर्यावरण के इस बड़े संकट को लेकर मई 2026 में अंतरराष्ट्रीय जर्नल एनपीजे नेचुरल हजार्ड्स में एक महत्वपूर्ण शोध प्रकाशित हुआ है। इस वैज्ञानिक शोध में स्पष्ट रूप से चेतावनी दी गई है कि लगातार बढ़ता हुआ तापमान पहाड़ी ढलानों की स्थिरता को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है, जिससे पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का खतरा अब वास्तविकता बन चुका है।[1]

किन्नौर में पर्माफ्रॉस्ट से उत्पन्न संभावित भूस्खलन एवं ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड के जोखिमों पर आईआईटी भुवनेश्वर के पृथ्वी, महासागर एवं जलवायु विज्ञान विद्यालय के शोधकर्ताओं अभिनव अलंगदान और आशीम सत्तार ने यह विस्तृत अध्ययन किया है। वैज्ञानिकों के इस गहन अध्ययन में पाया गया कि वर्ष 1951 से 2024 के बीच जिले में औसत तापमान में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस क्षेत्र में तापमान में वृद्धि की वार्षिक दर 0.016 से 0.019 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष के बीच मापी गई है जो पर्यावरण के लिहाज से बेहद चिंताजनक है।

शोध के मुख्य निष्कर्ष

अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में क्षेत्र के लगभग 660 गांवों का भी पूरी तरह से वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि इनमें से कई गांव ऐसी भौगोलिक जगहों पर बसे हुए हैं, जहां जमीन के ठीक नीचे सालों से जमी हुई बर्फ मौजूद है। पर्माफ्रॉस्ट के क्षरण से उत्पन्न होने वाले अचानक हिमस्खलन या चट्टानी धंसाव के कारण खतरनाक झील विस्फोटक बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है, जो नीचे बसे रिहायशी इलाकों के लिए अत्यंत विनाशकारी साबित होगी जिससे जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ रहा है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि ऐसा कोई बड़ा हादसा होता है तो बाढ़ का तेज पानी महज 16 से 18 मिनट के भीतर नीचे स्थित प्रमुख जलविद्युत परियोजना तक पहुंच सकता है। ऐसी गंभीर स्थिति को देखते हुए शोधकर्ताओं ने पर्माफ्रॉस्ट क्षेत्रों की निरंतर सैटेलाइट निगरानी करने और बेहद संवेदनशील घोषित इलाकों का विस्तृत मानचित्रण करने पर विशेष जोर दिया है। समय रहते कदम न उठाने पर यह संकट आने वाले समय में जान-माल का भारी नुकसान कर सकता है।

बढ़ता हुआ जल संकट

आईआईटी के इस शोध में सात ऐसी प्रमुख झीलों की सटीक पहचान की गई है, जो सीधे तौर पर पर्माफ्रॉस्ट क्षरण वाले बेहद संवेदनशील क्षेत्रों में स्थित हैं। इन सभी में से काशंग झील को सुरक्षा के लिहाज से सबसे अधिक जोखिम वाली झील बताया गया है। इस पूरे वैज्ञानिक अध्ययन में वर्ष 1976 से लेकर 2024 तक के विभिन्न उपग्रह चित्रों का गहन विश्लेषण किया गया है, जिसके आंकड़े और जमीनी बदलाव बेहद चौंकाने वाले और डराने वाले हैं।

उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1976 में इस झील का कुल क्षेत्रफल लगभग 33 हजार वर्गमीटर मापा गया था। यह क्षेत्रफल वर्ष 2024 तक रिकॉर्ड तेजी से बढ़कर 3.56 लाख वर्गमीटर से अधिक हो चुका है, जिसका सीधा मतलब है कि इसमें लगभग 11 गुना अधिक विस्तार हुआ है। वर्तमान में इस विशाल झील का कुल जल भंडार लगभग 86 lakh घनमीटर अनुमानित है, जिसके ठीक निचले हिस्से में काशंग जलविद्युत परियोजना संचालित हो रही है जिससे जलवायु परिवर्तन का खतरा और गंभीर हो गया है।

ढांचागत बुनियादी ढांचे पर संकट

पहाड़ी ढलानों के कमजोर होने के कारण किन्नौर की कई महत्वपूर्ण सड़कें, संपर्क मार्ग, पुल और अन्य ढांचागत परियोजनाएं इस समय पर्माफ्रॉस्ट वाले संवेदनशील इलाके की जद में आ चुकी हैं। अगर पहाड़ों के भीतर दबी यह बर्फ इसी रफ्तार से पिघलती रही, तो यह सभी विकास परियोजनाएं पूरी तरह खतरे की चपेट में आ सकती हैं। इसके साथ ही पर्माफ्रॉस्ट वाले इसी दुर्गम इलाके में भारत-तिब्बत सीमा की ओर जाने वाली कुछ बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक सड़कें भी शामिल हैं।

"पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से जलवायु परिवर्तन का खतरा अब एक बड़ा जोखिम बन चुका है। इसके समाधान के लिए वैज्ञानिक निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणालियों और जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे को हर स्तर पर मजबूत करने की तत्काल जरूरत है।" - पुष्पेंद्र राणा, निदेशक, विज्ञान प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण विभाग

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसी एवं स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। पहाड़ी क्षेत्रों में पर्माफ्रॉस्ट पिघलने और पर्यावरण संबंधी बदलावों की संवेदनशीलता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन के दिशा-निर्देशों का पालन करें। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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