स्वदेशी पहचान को मिलेगा बढ़ावा, लागू हुई सेना की नई ड्रेस नीति
भारतीय सेना की नई ड्रेस नीति के तहत अब सेना में औपनिवेशिक काल के प्रतीकों को हटाकर भारतीय सांस्कृतिक तत्वों और साझा यूनिफॉर्म नंबरिंग को लागू किया गया है।
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India
नई दिल्ली, दिल्ली। भारतीय सेना ने अपनी वर्दी के नियमों में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव करते हुए नई गाइडलाइन जारी की है। इस नए बदलाव का मुख्य उद्देश्य सेना से ब्रिटिश काल यानी औपनिवेशिक शासन के समय से चली आ रही कई पुरानी परंपराओं को हमेशा के लिए समाप्त करना है। सेना की नई ड्रेस नीति को लागू करने के पीछे मुख्य विचार सशस्त्र बलों में स्वदेशी पहचान को मजबूत करना और तीनों सेनाओं के बीच वर्दी में पूरी तरह से एकरूपता लाना है।[1]
आर्मी यूनिफॉर्म्स-2026 पैम्फलेट के अनुसार जारी किए गए इन संशोधित दिशा-निर्देशों में वर्दी के नामकरण को पूरी तरह मानकीकृत किया गया है। इसके साथ ही पुराने पड़ चुके शब्दों और सामानों को पूरी तरह हटा दिया गया है। इस ऐतिहासिक सुधार के तहत अब भारतीय सेना के पहनावे में पारंपरिक भारतीय तत्वों को शामिल किया जा रहा है, जिसे हाल के वर्षों में सेना के ड्रेस कोड में किया गया सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है।
तीनों सेनाओं में एकरूपता
सेना की नई ड्रेस नीति के तहत एक सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सुधार साझा यूनिफॉर्म नंबरिंग योजना को लागू करना है। यह विशेष नंबरिंग सिस्टम भारतीय सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायुसेना तीनों के बीच समान रूप से साझा किया जाएगा। इससे पहले तक तीनों सेनाएं औपचारिक, कामकाजी और लड़ाकू पोशाक की पहचान के लिए अपने-अपने अलग नियमों और प्रणालियों का पालन करती थीं, जिससे कई बार प्रशासनिक स्तर पर भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती थी।
पहले की अलग-अलग व्यवस्था के कारण संयुक्त सैन्य अभियानों, अंतर-सेवा वार्ताओं और विभिन्न प्रशासनिक संचार के दौरान अक्सर सैन्य कर्मियों के बीच असमंजस की स्थिति बन जाती थी। सेना की नई ड्रेस नीति में अब इस एकीकृत नंबरिंग प्रणाली के आ जाने से इस तरह की सभी विसंगतियां पूरी तरह से समाप्त हो जाएंगी। इससे विभिन्न प्रकार की ड्रेस श्रेणियों के संदर्भों को समझना पहले के मुकाबले काफी सरल, स्पष्ट और अधिक सुलभ हो जाएगा।
वर्दी की श्रेणियां
इस बड़े नीतिगत बदलाव और संशोधन के बाद भी भारतीय सेना ने अपने परिधानों की चार मुख्य श्रेणियों को पहले की तरह ही बरकरार रखा है। इन श्रेणियों में सेरेमोनियल ड्रेस यानी औपचारिक पोशाक, वर्किंग ड्रेस यानी कामकाजी पोशाक, मेस ड्रेस और कॉम्बैट ड्रेस यानी लड़ाकू पोशाक शामिल हैं। इन चारों श्रेणियों को सेना में आगे भी आधिकारिक रूप से जारी रखने का निर्णय लिया गया है।

प्रशासनिक कामकाज को आसान बनाने और त्वरित पहचान के लिए प्रत्येक श्रेणी को अब अलग-अलग विशिष्ट ड्रेस नंबर दिए गए हैं। इस सरल वर्गीकरण से सेना के सभी कमांड्स के बीच वर्दी को लेकर एकरूपता में काफी सुधार होने की पूरी उम्मीद है। इसके साथ ही अलग-अलग महत्वपूर्ण अवसरों और आधिकारिक कार्यक्रमों के लिए अधिकृत पोशाक के संबंध में सैन्य अधिकारियों के बीच होने वाला भ्रम भी पूरी तरह दूर हो जाएगा।
स्वदेशी पहचान का समावेश
इस नए ऐतिहासिक बदलाव में सबसे अधिक प्रतीकात्मक और महत्वपूर्ण बदलाव आधिकारिक नागरिक पोशाक के रूप में पारंपरिक 'बंडी जैकेट' को मंजूरी देना है। सेना का यह कदम सैन्य प्रतिनिधित्व में भारतीय सांस्कृतिक तत्वों को शामिल करने के राष्ट्रीय प्रयासों को दर्शाता है। सेना की नई ड्रेस नीति में शामिल बंडी जैकेट पिछले एक दशक में भारत के राजनयिक, सरकारी और विभिन्न औपचारिक आयोजनों में औपचारिक पहनावे के रूप में बहुत तेजी से लोकप्रिय हुई है।
"ब्रिटिश काल से विरासत में मिली कई परंपराओं ने सैन्य अनुशासन और व्यावसायिकता में योगदान दिया, लेकिन स्वतंत्रता के बाद के भारत में कुछ प्रतीकात्मक संदर्भ पुराने पड़ चुके हैं। इसलिए नए नियम मूल्यवान संस्थागत प्रथाओं को बनाए रखने और समकालीन राष्ट्रीय पहचान के साथ मेल न खाने वाली शब्दावली को हटाने के बीच स्पष्ट अंतर पैदा करते हैं।" - अनुभवी (ब्रिगेडियर) बीके खन्ना
पुरानी परंपराओं की विदाई
नए नियमों के तहत आधुनिक सैन्य अभ्यास में अनावश्यक या पुराने हो चुके कई सामानों और शब्दावलियों को पूरी तरह हटा दिया गया है। इसके तहत मेस ड्रेस नंबर 5 और 6 से 'पाउच बेल्ट' को पूरी तरह से हटा दिया गया है। इसके अलावा किसी भी सैन्य समारोह में मुख्य अतिथि यानी समीक्षा अधिकारी द्वारा तलवार ले जाने की अनिवार्यता को अब पूरी तरह वैकल्पिक कर दिया गया है, और 'रॉयल' जैसे पुराने औपनिवेशिक शब्दों का उपयोग बंद कर दिया गया है।
ऐतिहासिक रूप से औपचारिक वर्दी से जुड़ी रहने वाली पाउच बेल्ट की आधुनिक समय में कोई व्यावहारिक प्रासंगिकता नहीं बची थी, इसलिए इसे हटाकर ड्रेस को सरल बनाया गया है। इसी तरह समीक्षा अधिकारी के लिए तलवार रखने की अनिवार्यता खत्म होने से प्रोटोकॉल में लचीलापन आएगा। ब्रिगेडियर खन्ना के अनुसार, इन बदलावों से सैन्य समारोहों की गरिमा और गंभीरता को प्रभावित किए बिना वर्दी की अनावश्यक जटिलता काफी कम हो जाएगी।
चरणबद्ध तरीके से बदलाव
भारतीय सेना ने पुराने पड़ चुके कई ड्रेस पैटर्न्स को चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह वापस लेने की घोषणा की है। नीति में दिए गए एक प्रमुख उदाहरण के अनुसार, पुरानी ड्रेस नंबर 3A को आगामी 30 जून 2029 तक पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा। इस बदलाव के लिए सेना द्वारा दिया गया यह लंबा समय सैन्य इकाइयों को अपने मौजूदा स्टॉक को बदलने और नई व्यवस्था में ढलने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करेगा।
वर्दी बदलने की यह चरणबद्ध कार्यान्वयन रणनीति परिचालन तत्परता को प्रभावित किए बिना सेना की नई ड्रेस नीति को सुचारू रूप से लागू करने में मदद करेगी। ब्रिगेडियर खन्ना ने कहा कि इस रणनीतिक बदलाव से जहां एक तरफ वित्तीय लागत को कम से कम रखने में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी तरफ सेना की सभी फॉर्मेशन्स और टुकड़ियों के बीच वर्दी की पूर्ण एकरूपता सुनिश्चित की जा सकेगी।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसी एवं स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। भारतीय सेना के नए यूनिफॉर्म कोड और ड्रेस श्रेणियों से संबंधित आधिकारिक नियमों के लिए रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को ही सर्वोपरि मानें। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।