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राष्ट्रीय

हरित ऊर्जा का भविष्य, द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी से बढ़ेगी ताकत

जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और सतत विकास को गति देने के उद्देश्य से दो प्रमुख देश हरित ऊर्जा का भविष्य संवारने के लिए एक बार फिर साथ आए हैं।

By अजय त्यागी
1 min read
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

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नई दिल्ली, भारत। वैश्विक स्तर पर पैर पसारते ऊर्जा संकट और पर्यावरण परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों से निपटने के लिए नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के तत्वावधान में एक उच्च स्तरीय बैठक का सफल आयोजन किया गया। भारत-जर्मनी साझेदारी के तहत आयोजित इस विशेष संवाद श्रृंखला के दसवीं सत्र का मुख्य विषय नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से सुरक्षा हासिल करना था। इस महत्वपूर्ण बैठक में दोनों देशों के सरकारी अधिकारियों, उद्योग जगत के दिग्गजों, नीति निर्माताओं और निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों ने हिस्सा लिया ताकि हरित ऊर्जा का भविष्य सुरक्षित किया जा सके।[1]

इस विशेष वैश्विक आयोजन में शामिल नीति निर्माताओं ने इस बात पर गहराई से मंथन किया कि किस प्रकार भारत में स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज किया जाए और हरित ऊर्जा का भविष्य सुरक्षित किया जाए। वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीवाश्म ईंधन के बाजारों में छाई अनिश्चितता के बीच देश की ऊर्जा प्रणाली को और अधिक लचीला तथा मजबूत बनाने की तत्काल आवश्यकता है। बैठक में दोनों देशों ने आपसी सहयोग बढ़ाने और पर्यावरण अनुकूल तकनीकों के आदान-प्रदान पर विशेष सहमति जताई ताकि आने वाले समय में ऊर्जा की बढ़ती मांग को बिना किसी रुकावट के पूरा किया जा सके।

रणनीतिक कदम और साझेदारी

इस वैश्विक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भारत में जर्मनी के राजदूत डॉ. फिलिप एकरमैन ने स्पष्ट किया कि नवीकरणीय स्रोतों का विकास अब केवल पर्यावरण की रक्षा तक सीमित नहीं है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में यह कई प्रमुख राष्ट्रों के लिए एक बड़ा आर्थिक और रणनीतिक एजेंडा बन चुका है। भारत और जर्मनी दोनों का यह साझा लक्ष्य है कि आयातित कच्चे तेल और कोयले पर अपनी निर्भरता को तेजी से कम करके पूरी तरह से आत्मनिर्भरता हासिल की जाए, जिससे औद्योगिक क्षेत्रों को नई मजबूती मिलेगी।

राजनयिक संबंधों की लंबी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच सहयोग का दायरा अब पारंपरिक विकास से आगे बढ़कर जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग में बदल चुका है। वर्तमान में दोनों महाशक्तियां नवीकरणीय ऊर्जा के बड़े पैमाने पर विनिर्माण, अत्याधुनिक बैटरी स्टोरेज, ग्रिड इंटीग्रेशन, ऊर्जा दक्षता और हरित शहरी गतिशीलता जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मिलकर काम कर रही हैं। यह रणनीतिक तालमेल वैश्विक मंच पर हरित ऊर्जा का भविष्य तय करने में एक मील का पत्थर साबित होने वाला है।

"जलवायु कार्ययोजना, आर्थिक अवसर और मजबूत ऊर्जा सुरक्षा की त्रिमूर्ति ही नवीकरणीय स्रोतों को आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बनाती है. दोनों देश मिलकर वैश्विक स्तर पर नवाचार और निवेश को बढ़ावा देना जारी रखेंगे." : डॉ. फिलिप एकरमैन, जर्मन राजदूत

महात्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर

मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी ने इस अवसर पर कहा कि वर्तमान भू-राजनीतिक अनिश्चितता के माहौल में अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करना बेहद जरूरी हो गया है। पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट ने पूरी दुनिया को समय रहते सचेत कर दिया है कि जीवाश्म ईंधन का कोई ठोस विकल्प ढूंढना कितना अनिवार्य है। भारत में वर्तमान समय में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी कुल स्थापित बिजली क्षमता का लगभग चौवन प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जो देश की सही दिशा को दर्शाती है।

देश ने आने वाले वर्ष दो हजार तीस तक गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से पांच सौ गीगावाट बिजली क्षमता हासिल करने का बेहद साहसिक और ऐतिहासिक लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके साथ ही साल दो हजार सत्तर तक नेट-जीरो उत्सर्जन के अंतिम पड़ाव तक पहुंचने की प्रतिबद्धता जताई गई है। इन लक्ष्यों को पाने के लिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और नई बैटरी स्टोरेज तकनीकें रीढ़ की हड्डी की तरह काम करेंगी, जिससे कार्बन उत्सर्जन को न्यूनतम स्तर पर लाने में बड़ी सफलता मिलेगी।

"पश्चिम एशिया के संकट ने हमें ऊर्जा सुरक्षा के महत्व की याद दिलाई है. सोलर, विंड और ग्रीन हाइड्रोजन में सतत विकास के साथ सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपार क्षमता है, जिससे हरित ऊर्जा का भविष्य मजबूत होगा." : संतोष कुमार सारंगी, सचिव, नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय

सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत

इस गंभीर चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि भविष्य में ऊर्जा की बढ़ती मांग को देखते हुए बड़े पैमाने पर ग्रिड के आधुनिकीकरण और सार्वजनिक-निजी भागीदारी की सख्त जरूरत होगी। स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में अगला चरण केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें ट्रांसमिशन, घरेलू विनिर्माण और भारी उद्योगों के विद्युतीकरण को भी शामिल करना होगा। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, असली चुनौती तकनीक की उपलब्धता नहीं, बल्कि उसे मौजूदा सिस्टम में एकीकृत करने की है।

इस महत्वपूर्ण संवाद सत्र में रिन्यू की सह-संस्थापक वैशाली निगम सिन्हा और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की फेलो अपर्णा रॉय जैसी प्रमुख हस्तियों ने भी अपने विचार साझा किए। साल दो हजार सैंतालीस तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के बड़े सपने को पूरा करने में स्वच्छ ऊर्जा का यह विस्तार सबसे मुख्य स्तंभ बनने जा रहा है। दोनों देशों का यह साझा प्रयास पेरिस समझौते के लक्ष्यों और सतत विकास के वैश्विक उद्देश्यों को समय पर हासिल करने की दिशा में एक बहुत बड़ा और प्रभावी कदम है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसी एवं स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा नीतियों, द्विपक्षीय समझौतों और पर्यावरण संबंधी सरकारी गाइडलाइंस के आधिकारिक विवरण के लिए संबंधित मंत्रालयों की आधिकारिक वेबसाइट का अवलोकन करें। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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