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राजस्थान

फड़ चित्रकला: लोककला के संरक्षण हेतु कार्यशाला, एक अभिनव पहल

बीकानेर में अजित फाउण्डेशन द्वारा आयोजित कार्यशाला के माध्यम से राजस्थान की प्राचीन लोककला के संरक्षण हेतु एक अभिनव पहल की गई है।

By अजय त्यागी
1 min read
लोककला के संरक्षण हेतु कार्यशाला

लोककला के संरक्षण हेतु कार्यशाला

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बीकानेर, राजस्थान। स्थानीय अजित फाउण्डेशन की ओर से राजस्थान की अत्यंत प्राचीन लोककला को सहेजने हेतु एक विशेष साप्ताहिक कार्यशाला का आयोजन किया गया है। यह आयोजन मुख्य रूप से लोककला के संरक्षण की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। इस कार्यशाला के मुख्य प्रशिक्षक सुप्रसिद्ध चित्रकार एवं महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. राकेश किराडू ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि कलाकार के लिए लोककलाओं से जुड़ाव अनिवार्य है। डॉ. किराडू ने बताया कि फड़ शैली अब केवल भीलवाड़ा तक सीमित होती जा रही है, जिसे व्यापक बनाना समय की मांग है। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य लोककला के संरक्षण को सुनिश्चित करना और नई पीढ़ी को इस समृद्ध प्राचीन कला से जोड़ना है। डॉ. किराडू ने कहा कि कलाकार निराकार को साकार बना देता है, अमूर्त को मूर्त रूप दे देता है। चित्रकला की अलग-अलग शैलियों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि हम चित्रों की बनावट एवं रंग-संयोजन से चित्रशैली को पहचान सकते है।

"कोई भी कलाकार हो, उसको लोककलाओं से जुड़े रहना जरूरी है। जब तक लोक को वह जानेगा नहीं, तब तक वह अपनी संस्कृति को नहीं पहचान पाएगा।" : डॉ. राकेश किराडू, मुख्य प्रशिक्षक

कला के विविध आयाम

डॉ. राकेश किराडू के सान्निध्य में चल रही इस कार्यशाला में फड़ बनाने के इतिहास, तकनीक एवं रंग संयोजन का सैद्धांतिक और प्रायोगिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षक जयश्री सुथार, निशा सुथार एवं राम भादाणी प्रतिभागियों को मानवाकृति चित्रण, आंखों की बनावट, नुकीली नाक और विशिष्ट शारीरिक अनुपात जैसी तकनीकी बारीकियां समझा रहे हैं। संस्था समन्वयक संजय श्रीमाली ने बताया कि कार्यशाला लर्निंग बाय डूइंग सिद्धांत पर आधारित है। लगभग बावन युवा-युवतियां इस कला को सीखने में बढ़-चढ़कर रुचि ले रहे हैं।

फड़ चित्रकला की विशेषता

फड़ चित्रकला राजस्थान की एक अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध लोककला शैली है, जिसे 'चलती-फिरती मंदिर' के रूप में जाना जाता है। इसमें सूती कपड़े पर लोक देवताओं जैसे पाबूजी और देवनारायण जी की जीवन गाथाओं को प्राकृतिक रंगों, जैसे लाल, पीले, नीले, हरे और काले से चित्रित किया जाता है। पारंपरिक रूप से इसे जोशी परिवार के चित्रकारों द्वारा बनाया जाता है। यह कार्यशाला न केवल चित्रकला कौशल को बढ़ा रही है, बल्कि राजस्थान की गौरवमयी सांस्कृतिक परंपरा को सहेजने का भी कार्य कर रही है। आने वाले दिनों में यह प्रयास लोककला के संरक्षण के लिए एक नई मिसाल साबित होगा।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसी एवं स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचनात्मक उद्देश्य से किया गया है। फड़ चित्रकला के इतिहास, पारंपरिक तकनीकों एवं अजित फाउण्डेशन के आगामी कार्यक्रमों के आधिकारिक विवरण हेतु संस्था के अधिकृत सूचना पटल को ही आधार मानें। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक उत्तरदायी नहीं हैं।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

Editor-in-Chief