उम्र के आखिरी पड़ाव में हुनर से आत्मनिर्भरता की अनोखी कहानी
धनबाद की बुजुर्ग महिला हुनर से आत्मनिर्भरता की राह चुनकर मिसाल बनी हैं। आंखों से धुंधला दिखने के बावजूद बांस के उत्पाद बनाकर खुद को साबित कर रही हैं।
अस्सी वर्षीय तुसिया मोहली
धनबाद, झारखंड। धनबाद की बुजुर्ग महिला हुनर से आत्मनिर्भरता की राह चुनकर संघर्ष और हौसले की एक अनूठी मिसाल बनी हैं। बेलगड़िया स्थित मोहली बस्ती की रहने वाली अस्सी वर्षीय तुसिया मोहली की कहानी बताती है कि इच्छाशक्ति हो तो उम्र की बाधाएं भी छोटी पड़ जाती हैं। उन्होंने अपनी आंखों की रोशनी कम होने के बावजूद बांस से बनी वस्तुओं के निर्माण को अपनी हुनर से आत्मनिर्भरता का जरिया बनाया है, जो समाज के लिए एक प्रेरणा है।
लगभग बीस साल पहले पति कार्तिक मोहली के निधन के बाद तुसिया ने कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी। परिवार की जिम्मेदारी कंधों पर होने के कारण उन्होंने बांस के उत्पाद बनाना जारी रखा। हालांकि, समय के साथ उनकी आंखों की रोशनी बहुत कम हो गई, लेकिन बरसों के तजुर्बे ने उनके हाथों को इतना निपुण बना दिया है कि वे बिना स्पष्ट दृष्टि के भी टोकरियां और पंखे जैसी चीजें पूरी बारीकी से तैयार कर लेती हैं। [1]
संघर्ष और साहस
तुसिया मोहली के जीवन का संघर्ष हुनर से आत्मनिर्भरता की एक बड़ी गाथा है। हर दिन वे अपनी कलाकृतियों को सिर पर रखकर झरिया बाजार तक जाती हैं, जहां स्थानीय लोग उन्हें सहारा देकर पहुंचने में मदद करते हैं। यह मानवीय संवेदना का वह रूप है जो ग्रामीण भारत में आज भी जीवित है। बाजार में पहुंचने के बाद वे अपनी मेहनत से बनी इन चीजों को बेचकर सम्मानपूर्वक जीवन जी रही हैं।
बाजार में अपने हस्तनिर्मित उत्पादों को बेचकर तुसिया प्रतिदिन करीब 150 से 200 रुपये तक कमा लेती हैं। उनका कहना है कि हुनर से आत्मनिर्भरता ही उनकी जीविका का मुख्य आधार है, जिसे वे बचपन से कर रही हैं। हालांकि, उनका आर्थिक संघर्ष जारी है क्योंकि उन्हें सरकारी योजनाओं का पर्याप्त लाभ नहीं मिल पा रहा है, लेकिन वे किसी के आगे हाथ फैलाने के बजाय अपनी कला पर ही भरोसा करती हैं।
आर्थिक चुनौतियां
तुसिया ने बताया कि पहले उन्हें वृद्धावस्था पेंशन मिलती थी, लेकिन पिछले छह महीनों से वह भी बंद हो गई है। उनकी पारिवारिक स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके चार बेटों में से एक का निधन हो चुका है और एक बेटा मानसिक रूप से अस्वस्थ है। इसके बावजूद, तुसिया हुनर से आत्मनिर्भरता के अपने संकल्प पर अडिग हैं और अपने दम पर घर की दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
उनके बेटे गोलक मोहली ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि परिवार को राशन तो मिलता है, लेकिन घर की स्थिति अत्यंत जर्जर है। उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए कई बार आवेदन किया, लेकिन उन्हें अभी तक लाभ नहीं मिला है। यदि उन्हें समय पर आवास और पेंशन मिल जाए, तो तुसिया की जिंदगी आसान हो सकती है, जो आज भी अपने हुनर से आत्मनिर्भरता की राह पर निरंतर आगे बढ़ रही हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer):
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