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वैज्ञानिकों को नई एचआईवी वैक्सीन की खोज में मिली बड़ी सफलता

प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों को एक नई एचआईवी वैक्सीन के परीक्षण में अब तक की सबसे बड़ी सफलता मिली है।

By अजय त्यागी
1 min read
प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

प्रतीकात्मक फोटो - Rex TV India

वाशिंगटन, अमेरिका। एचआईवी वैक्सीन की खोज में जुटे दुनियाभर के वैज्ञानिकों को एक बहुत ही महत्वपूर्ण सफलता हाथ लगी है। प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित एक नए शोध के अनुसार पहली बार शोधकर्ताओं ने सामान्य इम्यून सिस्टम वाले बंदरों के शरीर में ऐसे शक्तिशाली एंटीबॉडी विकसित करने में सफलता हासिल की है जो खतरनाक एचआईवी वायरस को निष्क्रिय करने की क्षमता रखते हैं। हालांकि यह सफलता अभी शुरुआती स्तर पर बेहद सीमित है और इसे इस वैश्विक बीमारी का अंतिम समाधान बिल्कुल नहीं माना जा रहा है। [1]

पिछले चार दशकों में हुए वैक्सीन निर्माण के तमाम बड़े प्रयासों की विफलता के बाद विशेषज्ञ इस नई प्रगति को काफी महत्वपूर्ण मान रहे हैं। दरअसल एचआईवी वायरस अपने ऊपर शर्करा यानी ग्लाइकेन की एक मजबूत परत चढ़ा लेता है जिससे शरीर की सामान्य प्रतिरक्षा प्रणाली उसे आसानी से पहचान नहीं पाती है। इसके अलावा यह वायरस बहुत तेजी से म्यूटेट होकर अपना रूप बदलता है। शरीर में प्रवेश करने के बाद इसकी संरचना लगातार बदलती रहती है जिससे पुरानी तकनीकें निष्प्रभावी हो जाती हैं।

निर्माण के तीन चरण

शोधकर्ताओं ने इस विशेष एचआईवी वैक्सीन को मुख्य रूप से तीन तकनीकी चरणों में विकसित किया है जिसमें प्राइमिंग बूस्टिंग और पॉलिशिंग शामिल है। सबसे पहले शरीर में मौजूद बेहद दुर्लभ बी कोशिकाओं की पहचान की गई जिनमें वायरस से लड़ने वाले एंटीबॉडी बनाने की क्षमता थी। इसके बाद कई चरणों में जानवरों को ऐसे इंजेक्शन दिए गए जिनमें वायरस की संरचना के अधिक वास्तविक रूप दिखाए गए थे। इससे बी कोशिकाएं धीरे-धीरे समय के साथ वायरस को पहचानने में बेहतर होती चली गईं।

अंतिम चरण में एंटीबॉडी को इस उच्च स्तर तक विकसित करने की कोशिश की गई कि वे एचआईवी के कई अलग-अलग प्रकारों को आसानी से निष्क्रिय कर सकें। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों को दो तरह के परिणाम सामने देखने को मिले हैं। इसमें शामिल आधे से ज्यादा बंदरों में प्रतिरक्षा कोशिकाएं बिल्कुल सही दिशा में विकसित हुईं और चौवालीस फीसदी बंदरों के रक्त में वायरस को निष्क्रिय करने वाले एंटीबॉडी पाए गए। हालांकि केवल एक बंदर में एंटीबॉडी का स्तर उस सुरक्षात्मक सीमा तक पहुंचा।

ट्रायल के परिणाम

इस वैक्सीन के शुरुआती हिस्से का परीक्षण इंसानों पर पहले ही किया जा चुका है। अमेरिका में हुए एचवीटीएन चौदह ट्रायल में यह देखा गया कि क्या वैक्सीन सही बी कोशिकाओं को सक्रिय कर सकती है जिसके परिणाम सकारात्मक रहे थे। इसके बाद दिसंबर दो हजार पच्चीस में शुरू हुए आईएवीआई जी००४ ट्रायल में मॉर्डना की एमआरएनए तकनीक का उपयोग करते हुए अगले चरण की सघन जांच की जा रही है। हालांकि बंदरों पर इस्तेमाल की गई पूरी तीन चरणीय वैक्सीन का मानव परीक्षण अभी शुरू होना बाकी है।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आने वाले समय में इस शोध के आधार पर एक पूर्ण एचआईवी वैक्सीन तैयार की जा सकेगी जिससे इस जानलेवा संक्रमण को जड़ से खत्म करने में मदद मिलेगी। इस परीक्षण के सकारात्मक परिणाम ने चिकित्सा जगत में एक नई उम्मीद जगा दी है क्योंकि इससे पहले थाईलैंड और दक्षिण अफ्रीका में किए गए तमाम बड़े प्रोजेक्ट्स पूरी तरह विफल साबित हुए थे। अब वैश्विक स्तर पर इस नई तकनीक के इंसानों पर होने वाले परीक्षणों का इंतजार किया जा रहा है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। एचआईवी वैक्सीन की खोज से जुड़ा यह वैज्ञानिक अनुसंधान अभी अपने शुरुआती और चिकित्सीय परीक्षण के दौर में है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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