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अंतिम संस्कार के सालों बाद अपना घर आश्रम में जीवित मिला व्यक्ति

सालों पहले मृत मान चुके एक व्यक्ति के अचानक जीवित मिल जाने से परिवार में खुशियों की लहर दौड़ गई और इस पुनर्मिलन का जरिया अपना घर आश्रम बना है।

By अजय त्यागी
1 min read
12 साल बाद परिवार से पुनर्मिलन

12 साल बाद परिवार से पुनर्मिलन

भरतपुर, राजस्थान। कभी-कभी जिंदगी ऐसी अनूठी कहानी लिख देती है जिस पर सामान्य रूप से विश्वास करना बहुत कठिन हो जाता है। झारखंड के गढ़वा जिले के रहने वाले सुनील कुमार की दास्तान भी कुछ इसी तरह की अद्भुत है। जिस व्यक्ति को परिवार ने वर्षों पहले मृत मान लिया था और जिसका 7 वर्ष पहले धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार भी कर दिया गया था वह अचानक 12 वर्ष बाद जीवित मिल गया। इस अद्भुत चमत्कारिक घटना को सच करने में इस बार अपना घर आश्रम की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। [1]

लापता होने की कहानी

सुनील के पुत्र नरेंद्र यादव ने बताया कि करीब 12 वर्ष पहले उनके पिता अपनी बहन से मिलने बिहार के छपरा गए थे जहां से वे रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गए। उसी दौरान क्षेत्र में भीषण बाढ़ आई हुई थी जिससे परिवार को आशंका हुई कि वे नदी में बह गए होंगे। परिजनों ने रिश्तेदारों और सभी संभावित स्थानों पर उनकी तलाश की लेकिन कहीं कोई सुराग नहीं मिला। समय बीतने के साथ 7 वर्ष पहले उन्हें मृतक मानकर परिजनों ने उनका अंतिम संस्कार कर दिया और पत्नी अमरावती देवी ने विधवा की तरह जीवन जीना शुरू कर दिया।

संस्था के सचिव नरेंद्र तिवारी ने बताया कि सैकड़ों किलोमीटर दूर हरियाणा के अंबाला रेलवे स्टेशन पर कुछ समय पहले रेस्क्यू टीम को एक गंभीर रूप से बीमार और बेसहारा व्यक्ति मिला जो चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ था। प्राथमिक चिकित्सा के बाद उसे बेहतर इलाज के लिए भरतपुर स्थित अपना घर आश्रम मुख्यालय भेज दिया गया। यहाँ इस समर्पित अपना घर आश्रम ने उसके उपचार की पूरी जिम्मेदारी उठाई जिससे उसकी गंभीर हालत में धीरे-धीरे बहुत बड़ा सुधार होने लगा।

चमत्कारिक वापसी की राह

स्वास्थ्य में सुधार होने पर उसने झारखंड के गढ़वा जिले से जुड़ी जानकारियां साझा कीं। इसके बाद अपना घर आश्रम के पुनर्वास विभाग ने झारखंड पुलिस की मदद से उसके बताए पते की पुष्टि की और परिवार का पता लगाया। जब गांव में यह सूचना पहुंची कि सुनील कुमार जीवित हैं तो किसी को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। लेकिन पहचान की पुष्टि होने के बाद पूरे गांव में यह खबर आग की तरह फैल गई। पति को वापस सम्मान से घर ले जाने के लिए अमरावती देवी अपने पुत्र के साथ तुरंत यहाँ पहुँचीं।

यहाँ जब सुनील अपने बेटे से मिले तो पहली नजर में पहचान भी नहीं सके क्योंकि जब वे बिछड़े थे तब बेटा केवल 7 या 8 वर्ष का मासूम बच्चा था जो अब जवान हो चुका था। दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को देखते रहे और फिर गले लग गए जिससे वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। लेकिन सबसे भावुक पल तब आया जब वर्षों से विधवा का जीवन जी रही अमरावती देवी अपने जीवित पति के सामने पहुंचीं।

पुनर्जन्म का अहसास

अमरावती देवी की मांग से 7 वर्ष पहले सिंदूर मिटा दिया गया था और सुहाग के सभी चिह्न उतरवा दिए गए थे। वे इस बार अपनी मांग में सिंदूर सजाकर रंगीन साड़ी पहनकर आंखों में खुशी के आंसुओं के साथ अपने पति के सामने खड़ी थीं। यह केवल पति-पत्नी का मिलन नहीं था बल्कि एक स्त्री के सम्मान और उसकी सामाजिक पहचान के पुनर्जन्म जैसा पल था। सुनील कुमार के चेहरे पर भी भावनाओं का सैलाब साफ दिखाई दे रहा था।

सचिव नरेंद्र तिवारी ने बताया कि अपना घर आश्रम का उद्देश्य केवल असहाय बीमार लोगों को आश्रय देना या उनका उपचार करना नहीं है बल्कि उन्हें उनके परिवारों तक सुरक्षित पहुंचाकर सम्मानजनक जीवन वापस दिलाना भी है। इस तरह के प्रयास समाज में मानवीय मूल्यों को मजबूत करते हैं। इस सुखद घटनाक्रम के बाद लंबे समय से बिछड़े इस परिवार को वापस मिलाकर समाज में एक अनूठा उदाहरण पेश किया गया है। इस भावुक सफर के पूरा होने से क्षेत्र में इस सेवा कार्य की गूंज है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रिपोर्ट विश्वस्त समाचार एजेंसियों और स्रोतों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित है। इसका प्रकाशन केवल सूचना के उद्देश्य से किया गया है। भरतपुर के अपना घर आश्रम द्वारा एक बीमार निराश्रित व्यक्ति के उपचार और 12 वर्ष बाद उसके परिजनों से आत्मीय मिलन की वास्तविक गाथा को दर्शाने के लिए इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय के लिए लेखक, प्रकाशक एवं संपादक किसी भी रूप में उत्तरदायी नहीं होंगे।

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Ajay Tyagi - Editor In Chief

Ajay Tyagi

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